अग्नि परमेश्वर के लिए, जल और पवन की शुद्धि वा ईश्वर की आज्ञा पालन के अर्थ होत्र जो हवन अर्थात् दान करते हैं उसे अग्निहोत्र कहते हैं इस विकट कोरोना काल में आर्यसमाज की शीर्षस्थ सभा ‘सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा’ (दोनों पक्ष) के आह्नान पर 3 मई 2020 को प्रातः साढ़े 9 बजे पूरे विश्व में लाखों आर्यजनों ने अपने-अपने स्थान पर अग्निहोत्र का सम्पादन किया। यूँ तो प्रत्येक आर्य भाई-बहिन अपने घर में प्रतिदिन यज्ञ करते ही होंगे, पर एक ही समय पर पूरे विश्व में इस पवित्र कार्य का सम्पादन हमारी संगठन शक्ति को प्रदर्शित करता है। सबसे बड़ी बात, यह कैसे संभव हुआ मुझे पता नहीं, परन्तु सार्वदेशिक के दोनों पक्ष इसमें पूर्णतः मन से एक साथ थे। कोई होड़ नहीं, कोई स्पर्धा नहीं, सकारात्मकता से परिपूर्ण इस दिव्य परिवेश का हम पूरी तरह आनन्द लेना चाह रहे थे, पर यह सम्भव न हो सका। सोशल मीडिया पर कुछ वीडियो उपलब्ध हुए जिसमें देश विदेश के प्रमुख आर्य पदाधिकारियों के और आर्यसमाज से जुड़े गणमान्य लोगों द्वारा अग्निहोत्र को सम्पादित करते हुए वीडियो क्लिप के साथ यज्ञ की महत्ता को स्थापित करते हुए उनके उद्बोधन सम्मिलित थे। इन वीडियोज, जिनमें उपलब्ध उद्बोधन केवल आर्यसमाज की उच्चतम हस्तियों तक सीमित थे, में किसी के द्वारा यज्ञ सामग्री में प्याज डालने का सुझाव और किसी का धूप आदि जलाने के सुझाव, यह सोच कर डरा देने वाला था कि सिद्धान्तों के सन्दर्भ इन उच्चतम प्रमुखों की स्थिति क्या है। पर आर्य समाज में सैद्धान्तिक स्खलन का जो हाल है उस पर फिर कभी चर्चा करेंगे। अभी अपनी बात अग्निहोत्र तक सीमित रखेंगे। इसी वीडियो में आर्य जगत् की एक जानी मानी हस्ती का भी उद्बोधन था जिसमें उन्होंने यज्ञ की प्रक्रिया के बारे में भी कतिपय परिवर्तन के सुझाव दिए थे जिनमें दो बिन्दु महत्वपूर्ण थे – 1. घर के सदस्यों व सेवकों के नाम से आहुति दे सकते हैं वा देनी चाहये। 2. जो अन्य मतस्थ जन हैं वे वेदमंत्रों से आहुति न देकर, अल्लाह नमः, मोहम्मदाय नमः अथवा माता मरियमाय नमः आदि बोलकर आहुति दें ताकि पूरे विश्व में सभी लोग यज्ञ (अग्निहोत्र) कर सकें और इस प्रकार कोरोना में लड़ने में व्यापक सहभागिता हो सके। एक, अन्य वीडियो विदेशस्थ, उच्च स्तरीय पुरोहित जी द्वारा किये अग्निहोत्र का है, वे एक दीपक में एक कटोरी से घृत की आहुति दे रहे हैं। मन्त्र है- स्पष्ट है कि यह मन्त्र उनका स्वयं का बनाया है और इसके विनियोग का विधान कल्पकार ऋषि के रूप में उन्हीं का है। दोनों वीडियोज में अन्तर्निहित रूप से अग्निहोत्र के लाभों तथा विधि का प्रश्न उपस्थित है। प्रथम प्रश्न तो यह है कि कोई भी व्यक्ति चाहे वह आर्यसमाज अथवा समाज का कितना ही बड़ा विद्वान् या पदाधिकारी हो, क्या संस्कृत में, वह भी शुद्ध-अशुद्ध, कोई भी वाक्य बना उसका विधान और विनियोग अग्निहोत्र में कर सकता है? जैसे पंडित जी ने बनाया और अन्य माननीय ने अपने घर के सदस्यों और घर के सेवकों के नाम से बनाए होंगे। उदाहरण के तौर पर उनके घर पर कार्य करने वाले सहायक का नाम लक्ष्मण है तो से आहुति उन्होंने दी होगी।