हौंसलों की उड़ान
ये कहाँ आ गए हम
वासन्ती नवसस्येश्टि यज्ञ
दरकते रिश्ते
अहंकार का पराभाव
यथायोग्य व्यवहार
आओ चुकाएँ ऋण माता-पिता का
आधा अधूरा प्रयास
नमक का कर्ज
कहीं देश न जल जाए
[vc_row][vc_column][vc_column_text] भर्तृहरि जी ने ठीक ही लिख है कि मनुष्य की तृष्णा कभी जीर्ण नहीं होती। और वह तृष्णा अगर सत्ता की हो तो इतनी विकराल हो जाती है कि फिर व्यक्ति को समस्त दायित्व बोध, नैतिकता, सामजिक समरसता की भेंट चढ़ाने मेें एक क्षण की भी हिचकिचाहट नहीं होती। कहने को तो संविधान के […]