Aryavart Gallery
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Maharshi Vayu and Maharshi Agni
Arya Samaj Ke Sitare
स्वामी सर्वदानन्द जी
स्वामी सर्वदानन्द जी महाराज ने त्याग और तपस्या के उन स्तरों को स्पर्श किया कि योगी और विरक्त स्वामी जी को 'वीतराग' के नाम से सम्बोधित किया जाता था। आप मूर्धन्य स्थिर प्रज्ञता की जीवित मूर्ति थे। दयानन्द मठ, दीनानगर के आप अध्यक्ष रहे। आर्य जगत् में आपकी ख्याति अनुपम है।
स्वामी भवानी दयाल संन्यासी
प्रवासी भारतीयों के हित संरक्षक, आर्य समाज, आदर्श नगर अजमेर के संस्थापक, हिन्दी और अंग्रेजी साहित्य के धनी, लेखक, अद्वितीय कवि व पत्र सम्पादक थे।
पंडित अयोध्याप्रसाद वैदिक शोधकर्ता
पंडित जी मौलिक विचारक और प्रखर वक्ता थे। पंडित जी को वैदिक साहित्य के अन्वेषक के रूप में जाना जाता है। आपके पास विशाल पुस्तकालय था जिसे आपने महर्षि दयानन्द स्मारक ट्रस्ट टंकारा को समर्पित कर दिया।
आचार्य रामदेव
आचार्य रामदेव जी गुरुकुल कांगड़ी से सम्बद्ध रहे। भारतीय इतिहास के आप मर्मज्ञ विद्वान् थे। आपका व्यक्तित्व ओजस्वी त्यागी एवं तपस्वी था। आचार्य रामदेव बहुत ही प्रभावशाली वक्ता थे।
पंडित चमूपति एम.ए.
गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध आचार्य एवं कुलपति, ओजस्वी व्याख्याता, प्रभावशाली लेखक, बहुभाषाविज्ञ, भक्त कवि, सिद्धान्तप्रिय विद्वान् 'योगेश्वर कृष्ण', 'वैदिक स्वर', 'सोम सरोवर', 'जीवन ज्योति' आदि प्रसिद्ध रचनाओं के रचनाकार।
स्वामी ध्रुवानन्द सरस्वती
आपका जन्म मथुरा जिले के पानी गाँव में हुआ। ध्रुव तारे की तरह अटल निश्चय के धनी स्वामी जी ने २३ साल तक पशु चराने का कार्य किया। पर जब वे स्वामी सर्वदानन्द जी महाराज के संपर्क में आये तब उनकी प्रेरणा से वो ऊँचाइयाँ प्राप्त की कि आपका नाम आर्य समाज के चुनिन्दा विद्वानों में लिया जाता है। स्वामी जी ने हैदराबाद सत्याग्रह में चतुर्थ सर्वाधिकारी के रूप में भाग लिया। आप अपनी संगठन क्षमता के कारण सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के भी प्रधान बने। आपने विदेशों में प्रचार कार्य किया और अनेक राजघरानों ने उनकी विद्वता से प्रभावित हो उन्हें राजगुरु के पद पर अभिषिक्त किया।
स्वामी शंकरानन्द सरस्वती
दिव्य विभूति, अनुपम देवकाय, अद्भुत प्रतिभा सम्पन्न स्वामी शंकरानन्द जी सौराष्ट्र के राजा महाराजाओं में अत्यन्त ही आदर के पात्र थे और वे उनके सम्मानित गुरु रहे। आपने देश विदेश में वैदिक धर्म के संदेश वाहक के रूप में अद्भुत भूमिका निभाई।
स्वामी व्रतानन्द सरस्वती
आदित्य ब्रह्मचारी स्वामी व्रतानन्द सरस्वती ने अनेक गुरुकुलों की स्थापना की। चित्तौड़गढ़ राजस्थान में भी विख्यात् गुरुकुल की स्थापना आपके द्वारा हुई। आपका सारा जीवन महर्षि दयानन्द द्वारा प्रतिपादित शिक्षा प्रणाली के प्रति समर्पित रहा।
स्वामी नित्यानन्द सरस्वती
सर्वतोमुखी प्रतिभा वाले उद्भट विद्वान्, तेजस्वी, प्रभावशाली वक्ता स्वामी नित्यानन्द जी शास्त्रार्थ कला में निष्णात् थे। कश्मीर आदि राज्यों में आपको विशिष्ट ख्याति प्राप्त थी।
महात्मा नारायण स्वामी
कर्मयोगी, आर्य समाज के उज्ज्वल रतन, ऋषि भक्त, महात्मा नारायण स्वामी गुरुकुल वृन्दावन के आचार्य रहे। जब हैदराबाद सत्याग्रह हुआ तो आप प्रथम जत्थे के सेनापति थे। आपने जिस कुशलता के साथ नेतृत्व प्रदान किया, आपको प्रायः लौह पुरुष के रूप में याद किया जाता है।
स्वामी शुद्धबोध तीर्थ
सौम्य साधु स्वभाव, दोनों शिक्षा पद्धति में सिद्धहस्त, व्याकरणशास्त्र के पंडित शुद्धबोध तीर्थ, गुरुकुल कांगड़ी के प्रधानाचार्य और गुरुकुल ज्वालापुर के आचार्य एवं कुलपति के रूप में अपना योगदान देते रहे।
महात्मा आनन्द स्वामी
महात्मा आनन्द स्वामी का नाम भी हैदराबाद सत्याग्रह से तृतीय अधिकारी के रूप में गौरवपूर्ण रूप से जुड़ा हुआ है। गूढ़ से गूढ़ सैद्धान्तिक विषयों को अत्यन्त सरल, सरस तरीके से प्रस्तुत कर देना महात्मा आनन्द स्वामी की विशेषता थी। आपकी कथाओं में घंटों तक लोग सम्मोहित होकर बैठा करते थे। आपके द्वारा प्रणीत साहित्य जन सामान्य के द्वारा सर्वाधिक पसन्द किया जाता है।
स्वामी स्वतंत्रानन्द जी
उपदेशक महाविद्यालय के आचार्य स्वामीजी ने दयानन्द मठ दीनानगर की स्थापना की। जहाँ गुरु शिष्य परम्परा में अनेक महान् संन्यासियों ने अपना योगदान दिया। स्पष्ट वक्ता, अपरिग्रह के मूर्तिमान, प्रतिज्ञा के धनी, दृढ़ समय-पालक, कटु सत्य को कहने के साहसी शिरोमणि संन्यासी स्वामी स्वतंत्रानन्द जी प्रेरणा के स्रोत हैं।
स्वामी वेदानन्द तीर्थ
स्वामी जी वेदों के उद्भट विद्वान् तथा अद्भुत व्याख्याता थे। अनेक भाषाओं पर आपका असाधारण अधिकार था। आपने दशाधिक वेद स्वाध्याय ग्रन्थों का प्रणयन किया। सत्यार्थप्रकाश के स्थूलाक्षरी सटिप्पण संस्करण को प्रस्तुत करना आपकी मननशीलता का परिचायक है। स्वामी जी अद्भुत व्याख्याता भी थे और प्रभावशाली लेखक भी। आप 'दयानन्द संन्यासी, वानप्रस्थ मंडल' के संस्थापक रहे।
स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती
स्वामी जी को आर्य जगत् में वैज्ञानिक संन्यासी के रूप में ख्याति प्राप्त है। आपने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में रसायनशास्त्र विभाग के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। वैज्ञानिक शैली में आपके द्वारा लिखित ग्रन्थ बेजोड़ हैं। यज्ञ-विज्ञान पर आपकी अद्भुत पकड़ थी। देश विदेशों में आपने प्रचार हेतु भ्रमण किया।
स्वामी विश्वेश्वरानन्द सरस्वती
स्वामी जी स्वामी नित्यानन्द जी के अप्रतिम सहयोगी थे। प्रमुख शास्त्रार्थ महारथी के रूप में आपकी गणना की जाती थी। आपने 'वैदिक पदानुक्रमणी' का निर्माण किया। स्वामी जी को भी राजाओं में मध्य में अत्यन्त सम्मान प्राप्त था।
पंडित उदयवीरशास्त्री
आप ज्वालापुर गुरुकुल के स्नातक थे। शोध कार्य के प्रति आपकी विशेष रुचि थी। दर्शन के क्षेत्र के प्रसिद्ध विद्वान् रहे हैं और आपने वेदान्त, सांख्य वैशेषिक आदि दर्शनों के भाष्य किए हैं।
महाशय राजपाल
अत्यन्त सौम्य एवं शांत प्रकृति वाले, परिश्रमी, कर्तव्य परायण, धार्मिक पुस्तकों के प्रसिद्ध प्रकाशक, 'रंगीला रसूल' नामक तत्कालीन समय में प्रतिबंधित पुस्तक के प्रकाशक, जिन्होंने मतान्धों के हाथों अमर शहादत दी।
न्यायमूर्ति मेहरचन्द महाजन
भारत के उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश मेहरचन्द जी महाजन एक अद्भुत प्रशासक के रूप में भी जाने जाते थे। आप डी.ए.वी. कॉलेज के अध्यक्ष रहे और एक निष्ठावान आर्य के रूप में आपकी प्रतिष्ठा प्रसिद्ध है।
पंडित राजाराम शास्त्री
आप डी.ए.वी. कॉलेज लाहौर में संस्कृत के प्रवक्ता थे। दर्शन एवं उपनिषदों के प्रसिद्ध भाष्यकार के रूप में आपकी प्रतिष्ठा रही है। आपने वेद और स्मृतियों का अनुवाद किया है। आपने संस्कृत को सरल रूप से समझाने के लिए 'संस्कृत स्वयं शिक्षक' के नाम से भी पुस्तक लिखी।
पंडित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु
पंडित जी आर्ष पाठ विधि को पूर्णतः समर्पित थे और इस परम्परा को सुरक्षित और प्रसारित करने का श्रेय आपको जाता है। आपकी ख्याति पद वाक्य प्रमाणज्ञ के रूप में आज भी आर्यजनों के मध्य में है। महर्षि दयानन्दकृत यजुर्वेद भाष्य के व्याख्याकार, रामलाल कपूर ट्रस्ट के संचालक पंडित जिज्ञासु जी ने युधिष्ठिर जी मीमांसक जैसे प्रतिभावान और अनेकानेक आर्य विद्वान् आर्य जगत् को दिए।
पंडित गणपति शर्मा
आप चुरू राजस्थान के निवासी थे और संस्कृत साहित्य के प्रकाण्ड पंडित थे। शास्त्रार्थ महारथी के रूप में आपकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। सरल जीवन, संतोषी स्वभाव और विनोदप्रिय पंडित जी को महाराजा कश्मीर द्वारा भी सम्मानित किया गया।
पंडित रामचन्द्र देहलवी
पंडित जी आर्य जगत् के सबसे प्रसिद्ध शास्त्रार्थ महारथी रहे। अरबी भाषा मुस्लिम मत और कुरान पर आपको असाधारण अधिकार प्राप्त था। जब आप कुरान की आयतों का उच्चारण करते थे तो ऐसा लगता था कि कोई बहुत बड़े मौलाना इन आयतों का उच्चारण कर रहे हैं। पंडित जी असाधारण प्रतिभा सम्पन्न, मनमोहन व्यक्तित्व के धनी, अरबी के प्रकाण्ड विद्वान्, युक्ति-युक्त वक्ता थे।
पंडित भगवद्दत्त बी.ए.
पंडित भगवद्दत्त जी आर्य समाज के वैज्ञानिक मनीषी थे। अन्वेषण कला में आप निष्णात् थे। ‘वैदिक वाङ्मय का इतिहास’ एवं ‘भारत के बृहद् इतिहास’ जैसे महनीय ग्रन्थों का प्रणयन आपकी लौह कलम से हुआ।
भाई परमानन्द
भाई परमानन्द डी.ए.वी.कॉलेज लाहौर में प्रवक्ता के पद पर कार्यरत रहे। आपने विदेशों में वैदिक धर्म के प्रचारार्थ काफी कार्य किया। इस ओजस्वी क्रान्तिकारी देशभक्त को ब्रिटिश राज्यकाल में कालापानी दंड भोगना पड़ा। आपके गुणों पर मोहित होकर आपके नाम के आगे प्रायः देवतास्वरूप लगाया जाता है।
पंडित बिहारीलाल शास्त्री काव्य तीर्थ
अपने समय के प्रसिद्ध विद्यालय ‘आर्य मुसाफिर विद्यालय आगरा’ के आप प्रधानाचार्य रहे। आप ओजस्वी वक्ता और प्रकाण्ड विद्वान् थे। शास्त्रार्थ केसरी के रूप में आपने ख्याति प्राप्त की। गंभीर अवसरों पर आपका विनोदी स्वभाव हल्का फुल्का वातावरण कर देता था। अस्पृश्यता की दिशा में आपने बहुत कार्य किया। अनेक सम्मानों के साथ आपको मुस्लिम सम्प्रदाय द्वारा भी सम्मानित किया गया।
पंडित गंगाप्रसाद उपाध्याय
पंडित गंगाप्रसाद उपाध्याय का नाम एक प्रसिद्ध लेखक यशस्वी दार्शनिक और प्रकाशक के रूप में सुपरिचित है। संस्कृत हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी आदि अनेक भाषाओं पर आपको पूर्ण अधिकार प्राप्त था। आपने विपुल साहित्य का सृजन किया जो आज भी मनुष्य जाति की धरोहर है। आपको अनेक साहित्य पुरस्कारों से विभूषित किया गया।
Maharshi Vayu and Maharshi Agni
वेद: परमात्मा की वाणी
वेद परमपिता परमात्मा की कल्याणी वाणी है। परमपिता परमात्मा द्वारा सृष्टि की आदि में, अग्नि, वायु, आदित्य तथा अङ्गिरा ऋषियों के आत्मा में एक-एक वेद का प्रकाश किया। परमेश्वर के सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापक होने से जीवों को अपनी व्याप्ति से वेदविद्या के उपदेश करने में कुछ भी मुखादि की अपेक्षा नहीं है। वह अपनी अखिल वेद विद्या का उपदेश जीवस्थ स्वरूप से जीवात्मा में प्रकाशित कर देता है।
वेदों का विषय
"यह निश्चय है कि वेद ईश्वर से ही उत्पन्न हुए किसी मनुष्य से नहीं। और यह भी कि वेदों में समस्त विद्याएँ बीजरूप से विद्यमान हैं।" वेदों में प्राप्त मुख्य विषय - ब्रह्म विद्या, धर्म विद्या, सृष्टि-विद्या, पृथिव्यादि लोक भ्रमण, आकर्षणाकर्षण, प्रकाश्य-प्रकाशक विषय, गणित विद्या, स्तुति-प्रार्थना-याचना, समर्पण, उपासना, मुक्ति, नौविमानादि विद्या, तार विद्या, वैद्यक शास्त्र मूलक, पुनर्जन्म, विवाह, नियोग, राजप्रजाधर्म, वर्णाश्रम, पंचमहायज्ञ आदि।
महर्षि अग्नि
"महर्षि अग्नि पर ऋग्वेद प्रकटीभूत हुआ।"
महर्षि वायु
"महर्षि वायु पर यजुर्वेद प्रकटीभूत हुआ।"
Maharshi Aditya and Maharshi Angira
महर्षि आदित्य
"महर्षि आदित्य पर सामवेद प्रकटीभूत हुआ।"
महर्षि अंगिरा
"महर्षि अंगिरा पर अथर्ववेद प्रकटीभूत हुआ।"
Maharshi Patanjali and Maharshi Kanad
भारत के विज्ञानवेत्ता दार्शनिक - महर्षि कणाद
सांसारिक वैभव के प्रति नितान्त उदासीन तथा अर्थ संचय के प्रति उपेक्षावृत्ति रखने वाले कणाद के नाम को लेकर यह उक्ति प्रसिद्ध है कि अनाज की फसलों के कट जाने तथा खेतों के खाली हो जाने पर जो बचे खुचे अनाज के दाने वहाँ पड़े रहते उन्हें बीनकर ये ऋषि अपना भोजन बनाते और त्यागमय जीवन व्यतीत करते थे। इसीलिए उनका नाम कणाद ( कणों को भक्षण करने वाले ) पड़ गया था। सौराष्ट्र में द्वारिका के समीप का प्रभास पाटन उनका जन्म स्थान था। सोम शर्मा को उनका गुरु बताया गया है। अणु ( परमाणु एटम ) सिद्धान्त के आद्य प्रवर्तक कणाद ने जिस वैज्ञानिक तथ्यों से युक्त दर्शन का उपदेश दिया उसे वैशेषिक दर्शन कहा जाता है। इस दर्शन की मान्यता है कि उक्त छः या सात तत्त्वों के साधर्म्य तथा वैधर्म्य के समुचित ज्ञान से तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता है जो अनन्तः मनुष्य को निःश्रेयस ( मोक्ष ) के मार्ग पर ले जाता है।
योगदर्शन के रचनाकार - पतंजलि
योगदर्शन के रचनाकार पतंजलि काशी में ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में चर्चा में थे। इनका जन्म गोनारद्य ( गोनिया ) में हुआ। पतंजलि ने पाणिनी के अष्टाध्यायी पर अपनी टीका लिखी जिसे महाभाष्य कहा जाता है। इनका काल लगभग २०० ई. पू. माना जाता है। पतंजलि ने सर्वप्रथम इस ग्रंथ की रचना कर पाणिनी के व्याकरण की प्रामाणिकता पर अंतिम मोहर लगा दी थी। पतंजलि सर्वप्रथम योग विद्या को सुव्यवस्थित रूप दिया। पतंजलि के अष्टांग योग में धर्म और दर्शन की समस्त विद्या का समावेश तो हो ही जाता है साथ ही शरीर और मन के विज्ञान को पतंजलि ने योग सूत्र में अच्छे से व्यक्त किया है।
Maharshi Gautam and Maharshi Kapil
गौतम ऋषि
महर्षि गौतम न्याय दर्शन के प्रथम प्रवक्ता माने जाते हैं। उपलब्ध न्याय सूत्रों का उनके द्वारा प्रणयन किया गया। गौतम के न्याय सूत्र में पाँच अध्याय हैं जिनमें न्याय के विशिष्ट अंगों की व्याख्या की गई है। उनके अनुसार ज्ञान प्राप्ति के चार साधन माने गये हैं: प्रत्यक्ष प्रमाण, अनुमान प्रमाण, उपमान प्रमाण, और शब्द प्रमाण। भारतीय धर्म शास्त्रों के ज्ञाता गौतम ऋषि ने अपने ज्ञानकर्म द्वारा ऋषि परम्परा में अग्रणी स्थान प्राप्त किया।
सांख्यदर्शन के प्रवर्तक - कपिल मुनि
सांख्य दर्शन के प्रवक्ता महर्षि कपिल को संसार का प्रथम दार्शनिक माना जाता है। इनके पिता का नाम ऋषि कर्दम तथा माता का नाम देवहूति उल्लिखित है। सांख्य दर्शन के अनुसार संसार पच्चीस तत्त्वों से संयुक्त है। जड़ प्रकृति जो इस विश्व का उपादान कारण है त्रिगुणात्मिका (सत्व, रज तथा तम युक्त) है। परमात्मा से सान्निध्य का ईक्षण (इच्छा) से इसमें विकार उत्पन्न होता है जो आगे भौतिक जगत् का रूप लेता है। तीनों गुणों की साम्यावस्था ही प्रकृति है। सांख्य दर्शन का वास्तविक सूत्र कहता है कि त्रिविध दुःखों आधिदैविक, आधिभौतिक तथा आध्यात्मिक की अत्यन्त निवृत्ति अत्यन्त चरम पुरुषार्थ है और यह अत्यन्त निवृत्ति पुरुष जीव ब्रह्म तथा प्रकृति के यथार्थ ज्ञान से होती है।
Maharshi Valmiki and Maharshi Jaimini
महर्षि वाल्मीकि
महर्षि वाल्मीकि ऋषि प्रचेतस के पुत्र थे। काव्य सृजन की प्रेरणा उनको एक दुःखद दृश्य देखने से हुई। वे अपनी कलम से ऐसे व्यक्तित्व का निरूपण करना चाहते थे जिसकी तुलना संसार में हो ही न। इस बाबत् जब नारद मुनि से उन्होंने जानकारी चाही तो उन्होंने श्रीराम को सर्वश्रेष्ठ महापुरुष बताया। फलस्वरूप महर्षि वाल्मीकि की कलम से श्री राम चरित के रूप में अद्भुत काव्य का सृजन हुआ जिसे वाल्मीकि रामायण के नाम से जाना जाता है। वाल्मीकि श्री राम के समकालीन थे। अतएव विशद् प्रक्षेपों के उपरांत भी इतिहास के रूप में वाल्मीकि रामायण को मान्यता प्राप्त है।
पूर्व मीमांसा के प्रवर्तक - महर्षि जैमिनी
महर्षि वेद व्यास के शिष्य महर्षि जैमिनी भारत के प्रसिद्ध दार्शनिकों में से एक हैं। महर्षि जैमिनी पूर्व मीमांसा के प्रवर्तक हैं जो कि भारतीय षड्दर्शनों में से एक है। जैमिनी ने प्रसिद्ध ज्योतिष ग्रन्थ की भी रचना की जिसमे ४ अध्याय तथा १००० सूत्र हैं।
Maharshi Vedvyas and Maharshi Panini
वेदांत दर्शन के रचयिता - वेदव्यास
वेदांत दर्शन के रचयिता वेदव्यास ऋषि पराशर के पुत्र थे। व्यासजी ने महाभारत की रचना करने के पश्चात् ब्रह्मसूत्रों की रचना भी यहाँ की थी। व्यासजी कृष्ण द्वैपायन कहलाये क्योंकि उनका रंग श्याम था। वे पैदा होते ही माँ की आज्ञा से तपस्या करने चले गये थे और कह गये थे कि जब भी तुम स्मरण करोगी, मैं आ जाऊँगा। उन्होंने तीन वर्षों के अथक परिश्रम से महाभारत ग्रंथ की रचना की थी संस्कृत साहित्य में वाल्मीकि के बाद व्यास ही सर्वश्रेष्ठ कवि हुए हैं।
व्याकरणाचार्य - पाणिनी
पाणिनी ( ५०० ई. पू. ) संस्कृत भाषा के सबसे बड़े वैयाकरण हुए हैं। इनका जन्म तत्कालीन उत्तर पश्चिम भारत के गांधार में हुआ था। इनके व्याकरण का नाम अष्टाध्यायी है जिसमें आठ अध्याय और लगभग चार सहस्र सूत्र हैं। संस्कृत भाषा को व्याकरण सम्मत रूप देने में पाणिनी का योगदान अतुलनीय माना जाता है। अष्टाध्यायी मात्र व्याकरण ग्रंथ नहीं है। इसमें प्रकारांतर से तत्कालीन भारतीय समाज का पूरा चित्र मिलता है। उस समय के भूगोल, सामाजिक, आर्थिक, शिक्षा और राजनीतिक जीवन, दार्शनिक चिंतन, खान-पान, रहन-सहन आदि के प्रसंग स्थान-स्थान पर अंकित हैं।
Maharshi Aryabhatt and Maharshi Chanakya
वैज्ञानिक शास्त्रवेत्ता - गणितज्ञ - आर्यभट्ट
आर्यभट्ट एक ऐसे ही विद्वान् थे जिन्होंने गणितशास्त्र में अद्भुत व्युत्पन्नता प्राप्त की थी तथा अनेक नवीन सिद्धान्तों का निरूपण किया। इनका जन्म पाटलिपुत्र ( पटना ) के निकट ग्राम कुसुमपुर में हुआ। आर्यभट्ट का प्रसिद्ध ग्रन्थ आर्यभटीय है जिसका रचनाकाल ४९९ ई. है। आर्यभट्ट को त्रिकोणमिति का आविष्कर्त्ता माना जाता है। गणित और ज्योतिष के क्षेत्र में आर्यभट्ट के वैदुष्य को सर्वत्र ख्याति मिली।
आचार्य चाणक्य - राजनय और अर्थशास्त्र के ज्ञाता
वे कुटिल गोत्रोत्पन्न आचार्य चणक के पुत्र होने के कारण चाणक्य के नाम से प्रसिद्ध हुए जबकि उनका वास्तविक नाम विष्णुगुप्त था। राजनीति निपुण आचार्य विष्णुगुप्त ने अपना प्रख्यात ग्रन्थ अर्थशास्त्र लिखा जो राजनय तथा अर्थनीति (Political Economy) का प्रामाणिक ग्रन्थ है। चाणक्य ने धर्म के नाम पर प्रचलित पाखण्डों, अनाचारों तथा ठगाई का पर्दाफाश किया। कौटिल्य अर्थशास्त्र तथा चाणक्यनीति के विभिन्न संस्करण संस्कृत वाङ्मय के अमर रत्न हैं।
Maharshi Susrut and Maharshi Charak
शल्य क्रिया आचार्य सुश्रुत
सुश्रुत का समय ईसा पूर्व छः सौ वर्ष माना जाता है। आयुर्वेद में शल्य क्रिया का पूर्ण विवेचन मिलता है। आचार्य सुश्रुत इस विद्या के आचार्य थे। आचार्य सुश्रुत प्रसिद्ध वैदिक ऋषि विश्वामित्र के वंशज थे। आचार्य सुश्रुत का शल्यक्रिया विषयक ग्रन्थ सुश्रुत संहिता कहा जाता है। यह प्रसिद्ध है कि देव वैद्य धनवन्तरि ने जो एतद्विषयक उपदेश दिए उन्हें सुश्रुत संहिता में एकत्र किया गया है। आज जिसे प्लास्टिक सर्जरी कहा जाता है वह मूलतः भारत में प्रचलित रही है इसमें अंग प्रत्यारोपण आदि का विधान मिलता है।
आयुर्वेदाचार्य महर्षि चरक
प्रसिद्ध ग्रन्थ चरक संहिता के प्रणेता महर्षि चरक का काल २०० ई. माना जाता है। यह कुषाणवंश के सम्राट कनिष्क के राजवैद्य थे। चरक संहिता का मूल पाठ ऋषि अग्निवेश ने निर्धारित किया था। चरक ने इसमें नये प्रकरण जोड़े, इससे इसकी उपयोगिता बढ़ी। चरक संहिता आठ भागों में विभाजित है- सूत्र स्थान, निदान स्थान, विमान स्थान, शरीर स्थान, इन्द्रिय स्थान, चिकित्सा स्थान, कल्प स्थान तथा सिद्धि स्थान। इनमें शरीर के विभिन्न अंगों की स्थिति तथा चिकित्सा में प्रयुक्त होने वाली वनस्पतियों के गुण, प्रकृति आदि का विस्तृत परिचय दिया गया है। चरक संहिता विदेशी भाषाओं में अनूदित हो चुकी है। आयुर्वेद के इतिहास में महर्षि चरक को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।
Maharshi Varahamir, Bhashkaracharya & Bharadwaj
वराहमिहिर - महान खगोलशास्त्री और ज्योतिषी
वराहमिहिर प्राचीन भारत के एक अत्यंत प्रभावशाली खगोलशास्त्री और गणितज्ञ थे। उनकी महान कृति 'बृहत्संहिता' खगोल विज्ञान, ज्योतिष और वास्तुशास्त्र का एक विशाल विश्वकोश है। उन्होंने सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की परिक्रमा और नक्षत्रों की गति का सटीक वर्णन किया था।
भास्कराचार्य - प्रख्यात गणितज्ञ
भास्कराचार्य द्वितीय ने गणित और खगोल विज्ञान में क्रांतिकारी योगदान दिया। उनकी कृति 'सिद्धांत शिरोमणि' के चार भाग हैं, जिनमें 'लीलावती' और 'बीजगणित' विश्व प्रसिद्ध हैं। उन्होंने कैलकुलस और गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांतों की प्रारंभिक समझ विकसित की थी, जो आधुनिक विज्ञान के लिए भी विस्मयकारी है।
महर्षि भारद्वाज - विमान शास्त्र के प्रणेता
महर्षि भारद्वाज महान सप्तऋषियों में से एक थे। उन्हें 'यंत्र सर्वस्व' और 'विमान शास्त्र' का रचयिता माना जाता है, जिसमें प्राचीन विमानों की संरचना, ऊर्जा के स्रोतों और आकाश में उड़ने की तकनीकों का विस्तृत वर्णन है। उनके वैज्ञानिक चिंतन ने प्राचीन भारत को तकनीकी दृष्टि से समृद्ध किया।
Ramayan
पुत्रेष्टि यज्ञ
महाराज दशरथ प्रौढ़ावस्था को प्राप्त कर चुके थे। तीन रानियाँ थीं फिर भी पुत्र-सुख से वंचित थे। ऐसे में ऋषियों के मार्गदर्शन में उन्होंने श्रृंगी ऋषि के ब्रह्मत्व में पुत्रेष्टि यज्ञ का आयोजन किया। सम्पूर्ण वैज्ञानिक पद्धति के अवलम्बन से इस यज्ञ के फलस्वरूप श्री राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न जैसे पुत्रों की प्राप्ति महाराज दशरथ को हुई।
बाल्यकाल
राजपुत्रों में असाधारण गुणों को प्रस्फुटित करना कुलगुरु व विषय विशेषज्ञ ऋषियों का कार्य था। चारों भाइयों ने ऋषि वशिष्ठ के सान्निध्य में प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की। उनके शारीरिक, मानसिक तथा आत्मिक उत्कर्ष का सूत्रपात गुरुचरणों में ही हुआ।
यज्ञों की सुरक्षार्थ महर्षि विश्वामित्र श्री राम को लेने आए
रामायणकालीन समय राक्षस राजा रावण के द्वारा रक्ष संस्कृति के सर्वत्र प्रसार के प्रयत्नों का युग था। उसकी विस्तारवादी नीति ने उत्तर भारत तक अपने अनुयायियों को भेजकर वैदिक संस्कृति प्रोक्त यज्ञादि के उपक्रमों में विघ्न पैदा करने का कार्य किया। इनसे मुक्ति के लिए महर्षि विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को माँगने महाराज दशरथ के दरबार में पहुँचे। यद्यपि दशरथ की इच्छा नहीं थी परन्तु महर्षि वशिष्ठ के कहने पर श्रीराम तथा लक्ष्मण को विश्वामित्र के संरक्षण में जाने की आज्ञा दे-दी।
श्री राम विवाह
ऋषि विश्वामित्र की इच्छा थी कि श्री राम का विवाह जनकनन्दिनी सीता के साथ हो। इसी इच्छा को लेकर वे राजा जनक के यहाँ सीता स्वयंवर में पहुँचे। महाराजा जनक तो इस प्रस्ताव से अहादित ही हुए। सीता जी ने भी स्वयंवर के समय, उपयुक्त समझ श्री राम का ही चयन पति रूप में किया। पश्चात् श्री राम व सीता का विधिपूर्वक पाणिग्रहण संस्कार सम्पन्न हुआ, जिसमें महाराज जनक के निमंत्रित करने पर महाराज दशरथ आदि ने भी भाग लिया।
श्री राम वनवास
जब महाराज दशरथ व सम्पूर्ण राजपरिषद् ने श्री राम के गुणों के आधार पर युवराज के रूप में उन्हें अभिषिक्त करने का निर्णय लिया तो महारानी कैकेयी इससे सहमत नहीं हुईं क्योंकि वे अपने पुत्र भरत को अयोध्या की गद्दी पर विराजमान देखना चाहती थीं। वे रुष्ट होकर कोपभवन में चली गईं और महाराज दशरथ से पूर्व प्रतिज्ञा का स्मरण करा के भरत के लिए राजगद्दी और श्री राम के लिए चौदह साल के वनवास की माँग कर डाली। श्रीराम को जब यह पता चला तो पिता के आदेश के बिना ही उन्होंने माँ की इच्छा जान वनवास पर जाने का निर्णय ले लिया।
माता कौशल्या से आज्ञा
संध्या, अग्निहोत्रादि कर्म रामायणकालीन समाज के दैनिन्दिन कर्म थे। कोप भवन से निकलकर श्री राम ने अपनी माँ महारानी कौशल्या से आज्ञा लेने के हेतु से उनके महल में प्रवेश किया उस समय माता कौशल्या दैनिक अग्निहोत्र कर रही थीं। उन्होंने भी श्री राम को अन्ततोगत्वा अनुमति प्रदान कर दी। इस अवसर पर त्याग और समर्पण का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करते हुए महारानी सीता और श्री लक्ष्मण ने भी श्री राम के साथ वन में जाने का प्रण ले लिया।
वन गमन
श्री राम राजपरिवार के ही नहीं सम्पूर्ण अयोध्या के स्नेह के केन्द्र थे। जब अयोध्या राम के राज्याभिषेक की तैयारियों में व्यस्त थी, तब अचानक ही श्री राम के वनवास के समाचार को सुन सम्पूर्ण अयोध्यावासी स्तब्ध रह गए। उनके दुःख का कोई पारावार नहीं था। जब श्री राम महारानी सीता और लक्ष्मण वन को जाने लगे तो अयोध्यावासियों ने हर प्रकार से उन्हें रोकने का प्रयास किया, परन्तु दृढ़-प्रतिज्ञ राम ने सबको विनम्रता से मना कर दिया।
निषाद-मिलन
श्री राम के जीवन का प्रत्येक क्षण, उनका प्रत्येक कार्यकलाप मानवोचित मर्यादाओं को स्थापित करने वाला होता था। वन-गमन के क्रम में सरयू पार करने के लिए जब श्रीराम सरयू तट पर पहुँचे तो निषादराज उनकी सेवा में उपस्थित हुए। उन्होंने निषाद को गले लगाकर मानो सारी दुनिया को यह संदेश दिया कि आर्यावर्त्त में जन्मगत ऊँच-नीच व अस्पृश्यता के लिए न कोई स्थान था और न कोई स्थान हो सकता है।
ताड़का वध
महर्षि विश्वामित्र ने दोनों भाइयों को बला, अति बला तथा नाना प्रकार की विद्याओं की शिक्षा दी। यज्ञादि कार्यों में सर्वाधिक विघ्न डालने वाली राक्षसी ताड़का का वध भी श्री राम ने किया। इस प्रकार जहाँ एक ओर गुरुकुलों तथा आश्रमों को राम ने राक्षसों के त्रास से मुक्त किया, वहीं महर्षि विश्वामित्र से अनेक दिव्य शस्त्रास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया।
अहिल्या उद्धार
महर्षि गौतम ने देवराज इन्द्र के षड्यंत्र के चलते अपनी पत्नी देवी अहिल्या पर अविश्वास कर उन्हें त्याग दिया। देवी अहिल्या ने उसी दिन से एकान्तवास कर घोर तप करने का निश्चय किया। जिस समय जानकी के स्वयंवर में भाग लेने के लिए श्री राम, गुरु विश्वामित्र के साथ जनकपुरी जा रहे थे, रास्ते में गुरु से सारी कथा जानने के पश्चात् श्री राम ने इस घटना में देवी अहिल्या का कोई दोष नहीं माना और उनकी तपस्थली तक जाकर उनके चरणस्पर्श कर, उनका मान बढ़ाकर, एक तरह से श्रापित जीवन से उनका उद्धार किया।
चरण-पादुका
ननिहाल में प्रवास कर रहे, श्री राम वनवास से अनजान, श्री भरत व शत्रुघ्न को महाराजा दशरथ के देहान्त के कारण अयोध्या बुलाया गया। सारी घटना जानकर भरत अपनी माँ पर अत्यन्त कुपित हुए, पश्चात् माताओं और अयोध्या के गणमान्य लोगों को लेकर श्री राम को मनाकर वापस लाने के लिए चित्रकूट पहुँचे। परन्तु 'रघुकुल रीत सदा चलि आई प्राण जाये पर वचन न जाई' के धनी श्री राम ने वापस लौटने से मना कर दिया। ऐसे में संसार के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए भरत ने घोषणा की कि चौदह वर्ष तक श्री राम की चरण पादुकाएँ ही अयोध्या पर राज करेंगी वे केवल उनके प्रतिनिधि के रूप में शासन करेंगे।
शूर्पणखाँ
जिस समय श्री राम, पत्नी और भाई सहित पंचवटी में निवास कर रहे थे, रावण की बहिन शूर्पणखाँ जो कि अनिन्द्य सुन्दरी थी, ने राम को देखा और उन पर मोहित हो गई। उसने श्री राम से विवाह का प्रस्ताव किया। उनके मना करने पर लक्ष्मण से भी प्रस्ताव किया और उनके द्वारा भी ठुकराये जाने पर मानो 'नाक कट गई' ऐसा अनुभव करते हुए बदले की भावना को साथ लेकर लंका की ओर प्रस्थान कर गई। उसी ने रावण को सीता हरण के लिए उकसाया।
शबरी की भक्ति
सीता-हरण के पश्चात् उनकी खोज में भटकते हुए श्री राम व लक्ष्मण की मुलाकात शबरी नाम्नी वृद्धा आश्रमवासिनी से हुई। राम और लक्ष्मण के प्रति भक्ति भाव से ओतप्रोत शबरी ने मीठे बेरों से उनका आतिथ्य किया और दोनों भाइयों ने उस आतिथ्य को स्वीकार कर शबरी की भावना को उचित स्थान दिया। यहाँ भी श्री राम का मानवमात्र के प्रति समभाव द्योतित होता है।
आदित्य अखण्ड ब्रह्मचारी हनुमान
श्री हनुमान, अतुल बलशाली, मेधावी, पराक्रमी, उद्यमी, निर्लोभी, स्वामिभक्त, निर्भीक वक्ता, आदित्य अखण्ड ब्रह्मचारी होने के साथ परम ईश्वर भक्त थे। सन्ध्या-वन्दना अग्निहोत्रादि उनके दैनिन्दिन जीवन के अंग थे। सम्पूर्ण रामायण के अनेक प्रसंगों में श्री हनुमान के स्वामिभक्ति, वीरता, निर्भीकता व उच्च चरित्र के दर्शन होते हैं।
श्री हनुमान
सीताजी की खोज में दोनों भाई जब ऋष्यमूक पर्वत के नजदीक पहुँचे तो किष्किन्धा के राज्य से निष्कासित राजा सुग्रीव को शंका हुयी कि ये आगन्तुक कहीं उसके भाई बाली के भेजे हुए तो नहीं हैं? इनका परिचय जानने के लिए अपने सर्वसामर्थ्ययुक्त मंत्री श्री हनुमान को इनके नजदीक भेजा। थोड़े से ही सम्भाषण में हनुमान ने श्री राम की समस्त योग्यताओं और गुणों का अनुमान लगा लिया। उधर श्री राम भी हनुमान से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने लक्ष्मण को स्पष्ट कहा कि ये हनुमान चारों वेदों के पंडित हैं।
अशोक वाटिका
सीता जी की खोज में श्री हनुमान अतीव पुरुषार्थ के उपरांत लंका में प्रवेश कर माता सीता को खोजते हुए अन्ततोगत्वा अशोक वाटिका तक यह विचार कर पहुँच जाते हैं कि अगर माता सीता जीवित हैं तो किसी वाटिका में नदी के किनारे वे संध्या अवश्य करती होंगी और ऐसा स्थल उन्हें अशोक वाटिका दिखा। वहाँ माता सीता से उनका साक्षात्कार हुआ और उन्होंने श्री राम द्वारा भेजी हुई अंगूठी उन्हें दी और भरोसा दिलाया की बहुत शीघ्र श्री राम, रावण को उसके कृत्यों की सजा देकर उन्हें यहाँ से वापस ले जायेंगे।
सेतु निर्माण
सारी वानर सेना सहित लंका तक पहुँचने के लिए सबसे बड़ी बाधा समुद्र पार करने की थी। वानर सेना में नल और नील नाम के बड़े ही कुशल वास्तुशास्त्री मौजूद थे। उन्होंने समुद्र के उस स्थल का चयन किया जहाँ पानी सबसे ज्यादा उथला था और फिर वहाँ चट्टानों, वृक्षों और पेड़ों की टहनियों की सहायता से लंका तक एक सेतु का निर्माण किया जिसको पार करके श्री राम सहित सारी सेना लंका दुर्ग के समक्ष जा पहुँची।
रावण-वध
रावण के सेनापतियों, भाईयों, पुत्रों के साथ श्री राम व उनकी सेना का विकट युद्ध हुआ। अनेक विशिष्ट और दिव्याशस्त्रों का उपयोग इस युद्ध में हुआ। रावण के सभी महारथियों के काल कलवित होने के पश्चात् रावण का वध भी श्री राम द्वारा किया गया। यद्यपि रावण के पास श्री राम के मुकाबले साधनों की, रथों की प्रचुरता थी। परन्तु श्री राम का पक्ष सत्य और धर्म का था जिसकी विजय सदैव होती ही है।
अयोध्या प्रत्यागमन
रावण-वध के पश्चात् विभीषण को लंका का अधिपति बना, माता सीता को लेकर भाई व अन्य सेनापतियों सहित पुष्पक विमान से श्री राम अयोध्या लौटे। यह पुष्पक विमान काफी बड़ा और तीव्र गति से चलने वाला था। अयोध्या प्रत्यागमन के लिए इसका उपयोग श्री राम द्वारा इसलिए किया गया कि वह चौदह साल के वनवास का अन्तिम दिन था और भरत की दृढ़ प्रतिज्ञा थी कि तब तक अगर श्री राम वापस नहीं लौटे तो वे अपनी जीवन लीला को समाप्त कर देंगे।
लव-कुश
श्री राम अयोध्या के राज सिंहासन पर अभिषिक्त हुए और शासन के हर पक्ष में दुर्लभ उपलब्धियों को प्राप्त करते हुए ऐसे सुराज्य का निर्माण श्री राम ने किया कि उनकी प्रजा हर प्रकार से आनन्द का अनुभव करती थी। सभी अयोध्यावासियों में मानवता के उदात्त गुणों का समावेश था। इसीलिए आज तक भी सुराज्य के रूप में रामराज्य की ही कल्पना को संधारित किया जाता है। महारानी सीता जिस समय गर्भवती थीं तो होने वाली सन्तान में भी उदात्त गुणों का उद्भव हो इस निमित्त से श्री राम द्वारा महारानी सीता को ऋषि वाल्मीकि के आश्रम में भेज दिया गया। लव और कुश का जन्म वाल्मीकि ऋषि के आश्रम में ही हुआ।
Krantikari
अशफाकुल्ला खान
१९ दिसंबर १९२७ को देश की स्वाधीनता के लिए फंदा चूमने वाले अशफाकुल्ला खान पहले मुस्लिम क्रांतिकारी थे। उन्होंने देशवासियों के नाम अपने अंतिम संदेश में लिखा, ‘मुझे इस बात का गर्व है कि देश की आजादी के लिए शहीद होने वाला मैं पहला मुस्लिम होऊँगा।’ काकोरी ट्रेन लूट में अशफाकुल्ला ने अन्य क्रांतिकारियों का साथ दिया था, लेकिन वे अकेले ऐसे थे जो क्रूर ब्रिटिश पुलिस की पहुँच से बाहर थे। वे विदेश जाकर कमाई करके क्रांतिकारियों के लिए धन जुटाना चाहते थे। उन्होंने इस मकसद के लिए अपने एक पठान मित्र की मदद माँगी। लेकिन उस पठान ने पुलिस को खबर कर दी। अशफाकुल्ला और बिस्मिल दोनों ने एक ही दिन शहादत हासिल की, लेकिन अलग-अलग जेलों में।
भगत सिंह
भगत सिंह का जन्म २८ सितंबर, १९०७ में हुआ था। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था। यह एक सिख परिवार था जिसने आर्य समाज के विचार को अपना लिया था। उनके परिवार पर आर्य समाज व महर्षि दयानन्द की विचारधारा का गहरा प्रभाव था ! अधिकांश क्रांतिकारियों को देश प्रेम की प्रेरणा महर्षि दयानन्द के साहित्य व आर्य समाज से मिली। भगतसिंह ने देश की आजादी के लिए जिस साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुकाबला किया, वह आज के युवकों के लिए एक बहुत बड़ा आदर्श है। इन्होंने केन्द्रीय संसद (सेन्ट्रल असेम्बली) में बम फेंककर भी भागने से मना कर दिया। जिसके फलस्वरूप इन्हें २३ मार्च १९३१ को इनके दो अन्य साथियों, राजगुरु तथा सुखदेव के साथ फाँसी पर लटका दिया गया।
पण्डित चन्द्रशेखर आजाद
(२३ जुलाई, १९०६-२७ फरवरी, १९३१)। ‘आजाद’ ने राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में पहले ९ अगस्त १९२५ को काकोरी काण्ड किया और फरार हो गये। उन्होंने उत्तर भारत की सभी क्रान्तिकारी पार्टियों को मिलाकर एक करते हुए हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसियेशन का गठन किया तथा भगत सिंह के साथ लाहौर में लाला लाजपत राय की मौत का बदला साण्डर्स का वध करके लिया एवम् दिल्ली पहुँच कर असेम्बली बम काण्ड को अंजाम दिया। अल्फ्रेड पार्क में अपने एक मित्र सुखदेव राज से मन्त्रणा कर ही रहे थे तभी सी.आई.डी. का एस.एस.पी. नॉट बाबर जीप से वहाँ आ पहुँचा। उसके पीछे-पीछे भारी संख्या में कर्नलगंज थाने से पुलिस भी आ गयी। दोनों ओर से हुई भयंकर गोलीबारी में आजाद को वीरगति प्राप्त हुई। यह दुखद घटना २७ फरवरी १९३१ के दिन घटित हुई और हमेशा के लिये इतिहास में दर्ज हो गयी।
दामोदर चाफेकर
२२ जून, १८९७ को रैंड को मौत के घाट उतार कर भारत की आजादी की लड़ाई में प्रथम क्रांतिकारी धमाका करने वाले वीर दामोदर पंत चाफेकर का जन्म २४ जून, १८६९ को पूणे के ग्राम चिंचवड़ में प्रसिद्ध कीर्तनकार हरिंपत चाफेकर के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में हुआ था। वाल्टर चार्ल्स रैण्ड तथा आयर्स्ट- ये दोनों अंग्रेज अधिकारी लोगों को जबरन पूणे से निकाल रहे थे। ये अधिकारी प्लेग पीड़ितों की सहायता की जगह लोगों को प्रताड़ित करना ही अपना अधिकार समझते थे। १८अप्रैल, १८९८ को प्रातः ‘गीता’ पढ़ते हुए दामोदर हरि चाफेकर फाँसीघर पहुँचे और फाँसी के तख्ते पर लटक गए। उस क्षण भी ‘गीता’ उनके हाथों में थी।
वासुदेव बलवंत फड़के
जिनका केवल नाम लेने से युवकों में राष्ट्रभक्ति जागृत हो जाती थी, ऐसे थे वासुदेव बलवंत फड़के। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के आद्य क्रांतिकारी थे। महाराष्ट्र की कोळी, भील तथा धांगड जातियों को एकत्र कर उन्होंने ‘रामोशी’ नाम का क्रान्तिकारी संगठन खड़ा किया। अपने इस मुक्तिसंग्राम के लिए धन एकत्र करने के लिए उन्होंने धनी अंग्रेज साहूकारों को लूटा। फड़के को तब विशेष प्रसिद्धि मिली जब उन्होंने पूणे नगर को कुछ दिनों के लिए अपने नियंत्रण में ले लिया था। २० जुलाई १८७९ को वे बीजापुर में पकड़ में आ गए। अभियोग चला कर उन्हें काले पानी का दंड दिया गया। अत्याचार से दुर्बल होकर एडन के कारागृह में उनका देहांत हो गया।
कन्हाई लाल दत्त
कन्हाई लाल दत्त का जन्म १८८८ की जन्माष्टमी के दिन हुआ था। उनका बचपन चन्दन नगर मे व्यतीत हुआ। चारू चन्द्र राय इनके क्रान्तिकारी गुरु थे। प्रसिद्ध सन्त अरविन्द घोष के नेतृत्व में अलीपुर बम काण्ड घटित हुआ। गिरफ्तार हुए क्रान्तिकारियों में से एक जमींदार का पुत्र नरेन गोस्वामी गद्दार निकला और वह सरकारी गवाह बन गया। क्रान्तिकारियों ने नरेन को समाप्त करने का निर्णय लिया। यह काम कन्हाई लाल दत्त को सौंपा जिन्हें सत्येन्द्र नाथ बोस के साथ मिलकर यह कार्य करना था। इस कार्य के लिए सत्येन्द्र नाथ पहले ही जेल-हॉस्पीटल पहुँच गये थे। कन्हाई भी दर्द के बहाने हॉस्पीटल में प्रविष्ट हो गए। गद्दार नरेन को अपने पिस्तल की अन्तिम गोली कन्हाई ने ही मारी। २ अक्टूबर १९०८ को इन्हें फाँसी दे दी गयी।
मदन लाल ढींगरा
मदन लाल ढींगरा का जन्म १८ सितंबर, १८८३ एक हिंदू खत्री परिवार में हुआ था। उनके पिता दित्ता मल एक मशहूर और धनी सिविल सर्जन थे। जब मदनलाल को भारतीय स्वतंत्रता सम्बन्धी क्रान्ति के आरोप में लाहौर के एक कॉलेज से निकाल दिया गया तो परिवार ने मदनलाल से नाता तोड़ लिया। बाह्य आर्थिक सहयोग से मदन लाल इंग्लैण्ड पहुँचे। इंडिया हाउस नामक एक संगठन में, जो उन दिनों भारतीय विद्यार्थियों के राजनैतिक क्रियाकलापों का केन्द्र था, वहाँ मदनलाल ढींगरा भारत के प्रख्यात राष्ट्रवादी विनायक दामोदर सावरकर एवं श्यामजी कृष्ण वर्मा के सम्पर्क में आए। १ जुलाई, १९०९ की शाम को इण्डियन नेशनल एसोसिएशन् के वार्षिकोत्सव में भाग लेने के लिये भारी संख्या में भारतीय और अंग्रेज इकट्ठे हुए। इसमें सर कर्जन वायली भी शामिल थे। इसी दौरान मदनलाल ने कर्जन वाईली को गोली मार दी। अंत में १७ अगस्त, १९०९ को उन्हें फाँसी दे दी गई।
मंगल पाण्डे
मंगल पाण्डे का जन्म ३० जनवरी १८३१ को बलिया जिले के नगवा गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम सुदिष्ट पाण्डे था। ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा हिन्दुस्तानी आवाम पर ढ़ाये जा रहे जुल्म, ईसाई पादरियों द्वारा धर्मान्तर के लिये बढ़ते दबाब जनता के दिलों में अंग्रेजी हुकूतम के प्रति नफरत और बगावत की अलख जगा दी थी। बगावत का बीड़ा मंगल पाण्डे ने उठाया। २९ मार्च को परेड ग्राउंड में ही मंगल ने अपने साथी भारतीय सैनिकों को विद्रोह के लिए ललकारा, उन्होंने सार्जेन्ट मेजर ह्यूसन की हत्या कर दी। लेफ्टिनेन्ट बाब भी मंगल के अदम्य साहस व वीरता सामने कुछ न कर सका। मंगल की बंदूक फिर चली घोड़े सहित बाब जमीन पर गिर गया। फौजी अदालत ने मंगल को फाँसी की सजा सुना सुनाई। बैरकपुर के परेड मैदान में कड़ी सुरक्षा के बीच ८ अप्रैल १८५७ को प्रातः ५.३० बजे उन्हें फाँसी पर लटकाया गया।
राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी
प.बंगाल ( आज का बांग्लादेश ) में पबना जिले के अन्तर्गत मड़याँ ( मोहनपुर ) गाँव में २३ जून १९०१ के दिन क्षिति मोहन लाहिड़ी के घर राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी का जन्म हुआ। उनकी माता का नाम बसन्त कुमारी था। राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को देश-प्रेम और निर्भीकता की भावना विरासत में मिली थी। राजेन्द्रनाथ काशी की धार्मिक नगरी में पढाई करने गये थे किन्तु संयोगवश वहाँ पहले से ही निवास कर रहे सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी शचींद्रनाथ सान्याल के सम्पर्क में आ गये।राजेन्द्र लाहिड़ी को काकोरी काण्ड में शामिल करने के लिये बंगाल से लखनऊ लाया गया। अन्ततः राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, पण्डित राम प्रसाद बिस्िमल, अशफाक उल्ला खाँ तथा ठाकुर रोशन सिंह-एक साथ चार व्यक्तियों को फाँसी की सजा सुना दी गयी। लाहिड़ी को अन्य क्रान्तिकारियों से दो दिन पूर्व १७ दिसम्बर को ही फाँसी दे दी गयी।
शिवराम हरि राजगुरु
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रान्तिकारी थे ।इन्हें भगत सिंह और सुखदेव के साथ १२ मार्च १९३१ को फाँसी पर लटका दिया गया था। छोटी उम्र में ही ये वाराणसी विद्याध्ययन करने एवं संस्कृत सीखने आ गये थे। इन्होंने हिन्दू धर्म-ग्रन्थों तथा वेदों का अध्ययन किया। राजगुरु एक अच्छे निशानेबाज भी थे। साण्डर्स का वध करने में इन्होंने भगत सिंह तथा सुखदेव का पूरा साथ दिया था। २३ मार्च १९३१ को इन्होंने भगत सिंह तथा सुखदेव के साथ लाहौर सेन्ट्रल जेल में फाँसी के तख्ते पर झूल कर अपने नाम को हिन्दुस्तान के अमर शहीदों की सूची में प्रमुखता के साथ अंकित करा दिया।
रासबिहारी बोस
रासबिहारी बोस ( जन्म २५ मई, १८८६-मृत्यु २१ जनवरी, १९४५ ) भारत के एक क्रान्तिकारी नेता थे जिन्होंने ब्रिटिश राज के विरुद्ध गदर षड्यंत्र एवं आजाद हिन्द फौज के संगठन का कार्य किया। इन्होंने न केवल भारत में कई क्रान्तिकारी गतिविधियों का संचालन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी, अपितु विदेश में रहकर भी वह भारत को स्वतन्त्रता दिलाने के प्रयास में आजीवन लगे रहे। दिल्ली में तत्कालीन वायसराय लार्ड चार्ल्स हार्डिंग पर बम फेंकने की योजना बनाने, गदर की साजिश रचने और बाद में जापान जाकर इंडियन इंडिपेंडेंस लीग और आजाद हिंद फौज की स्थापना करने में रासबिहारी बोस की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
सत्येन्द्र नाथ बोस
सत्येन्द्र नाथ बोस अरविन्द के मामा थे, पर आयु में उनसे बहुत छोटे थे। सत्येन्द्र का स्वास्थ्य अवश्य कमजोर था पर आत्म बल की कोई कमी नहीं थी। श्वास के रोगी हाने के कारण उन्हें क्रान्तिकारियों की योजना के अन्तर्गत स्वयं को अस्पताल स्थान्तरित कराने में कोई परेशानी नहीं हुई। जहाँ उन्होंने अलीपुर बम केस में सरकारी गवाह बन चुके नरेन गोस्वामी को यह कहकर बुलवाया कि वे स्वयं भी सरकारी गवाह बनना चाहते हैं। नरेन गोस्वामी प्रसन्नता पूर्वक इनके पास आया, जहाँ इन्होंने कन्हाई लाल दत्त के साथ मिलकर इस गद्दार को गोली मारकर इस संसार से विदा करने में अहम भूमिका निभाई। न्यायालय ने मुकदमे के ड्रामे के पश्चात् २ अक्टूबर १९०८ को मृत्युदण्ड की सजा सुना दी।
खुदीराम बोस
भारतीय स्वाधीनता संग्राम की क्रांतिकारी धारा में त्याग और बलिदान का जज्बा पैदा करने और देश में आजादी के लिए जान न्योछावर करने का साहस भरने वाले प्रथम सेनानी खुदीराम बोस माने जाते हैं। बंगाल में मिदनापुर जिले के हबीबपुर गाँव में त्रैलोक्य नाथ बोस के यहाँ ३ दिसंबर १८८९ को इनका जन्म हुआ। उन दिनों किंग्सफोर्ड चीफ प्रेजिडेंसी मजिस्ट्रेट क्रांतिकारियों को बहुत तंग करता था। क्रांतिकारियों ने उसे मार डालने की ठान ली थी। ३० अप्रैल, १९०८ की रात के साढ़े आठ बजे मिसेज कैनेडी और उसकी बेटी अपनी बग्घी में बैठकर क्लब से घर की तरफ आ रहे थे। उनकी बग्घी बिल्कुल किंग्सफर्ड की बग्घी से मिलती-जुलती थी। खुदीराम बोस तथा उसके साथी ने किंग्सफर्ड की बग्घी समझकर उस पर बम फेंक दिया जिससे उसमें सवार माँ-बेटी की मौत हो गई। ११ अगस्त, १९०८ को इस वीर क्रांतिकारी को फाँसी पर चढ़ा दिया गया।
सुखदेव थापर
सुखदेव थापर का जन्म पंजाब के शहर लायलपुर में श्रीयुत् रामलाल थापर व श्रीमती रल्ली देवी के घर विक्रमी सम्वत् १९६४ के फाल्गुन मास में शुक्ल पक्ष सप्तमी तदनुसार १५ मई १९०७ को हुआ था। इन्होंने भगत सिंह, कमरेड रामचन्द्र एवम् भगवती चरण बोहरा के साथ लाहौर में नौजवान भारत सभा का गठन किया था । गान्धी-इर्विन समझौते के सन्दर्भ में इन्होंने एक खुला खत गान्धी के नाम अंग्रेजी में लिखा था जिसमें इन्होंने महात्मा जी से कुछ गम्भीर प्रश्न किये थे। भगत सिंह तथा राजगुरु के साथ सुखदेव भी मात्र २३ वर्ष की आयु में शहीद हो गये।
श्यामजी कृष्ण वर्मा
श्यामजी कृष्ण वर्मा का जन्म ४ अक्टूबर, १८५७ को गुजरात प्रान्त के माण्डवी कस्बे में श्रीकृष्ण वर्मा के यहाँ हुआ था। श्यामजी कृष्ण वर्मा क्रान्तिकारी गतिविधियों के माध्यम से भारत की आजादी के संकल्प को गतिशील करने वाले अध्यवसायी एवं कई क्रान्तिकारियों के प्रेरणास्रोत थे। वे पहले भारतीय थे, जिन्हें आक्सफोर्ड से एम.ए. और बार-एट-लॉ की उपाधियाँ मिलीं थीं। पूणे में दिये गये उनके संस्कृत के भाषण से प्रभावित होकर मोनियर विलियम्स ने वर्माजी को ऑक्सफोर्ड में संस्कृत का सहायक प्रोफेसर बना दिया था। उन्होंने लन्दन में इण्डिया हाउस की स्थापना की जो इंग्लैण्ड जाकर पढ़ने वाले छात्रों के परस्पर मिलन एवं विविध विचार-विमर्श का एक प्रमुख केन्द्र था।
सुभाषचन्द्र बोस
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का जन्म २३ जनवरी सन् १८९७ को ओडिशा के कटक शहर में हुआ था। उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और माँ का नाम प्रभावती था। सुभाष नेता जी के नाम से ज्यादा जाने जाते हैं। वे भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रणी नेता थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिये, उन्होंने जापान के सहयोग से आजाद हिन्द फौज का गठन किया था। उनके द्वारा दिया गया ‘जय हिन्द’ का नारा भारत का राष्ट्रीय नारा बन गया है। ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूँगा’ का नारा भी उनका उस समय अत्यधिक प्रचलन में आया।
Maharana Pratap
मानसिंह का मिथ्या अभिमान
अकबर के सेनापति मानसिंह शोलापुर विजय करके लौट रहे थे। महाराणा ने उनके स्वागत का प्रबंध उदयसागर पर किया। मानसिंह भोजन के लिए पधारे, किन्तु महाराणा को न देखकर आश्चर्य में पड़ गये। उन्होंने बताया कि पिता जी के सिर में दर्द है। महाराणा प्रताप मानसिंह (जिसकी बुआ जोधा बाई अकबर जैसे विदेशी से ब्याही गई थी) के साथ भोजन करना अपना अपमान समझते थे।
वीर शिरोमणि का जन्म
महाराणा प्रताप का जन्म मेवाड़ के शिसोदिया राजवंश में ९ मई १५४० को हुआ। उनका नाम इतिहास में वीरता और दृढ़ प्रण के लिये अमर है। उन्होंने कई सालों तक मुग़ल सम्राट अकबर के साथ संघर्ष किया। महाराणा प्रताप का जन्म कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ था। महाराणा प्रताप की माता का नाम जयवन्ताबाई था, जो पाली के सोनगरा अखैराज की बेटी थीं। महाराणा प्रताप को बचपन में कीका के नाम से पुकारा जाता था।
सेनानियों से युद्ध मंत्रणा
राणा प्रताप जब सिंहासनारूढ़ हुए तब उनकी राजधानी चित्तौड़ एवं उसकी मैदानी भूमि पर विदेशियों का अधिकार हो गया था। प्रताप ने यह प्रतिज्ञा ली कि जब तक चित्तौड़ पर शासन स्थापित नहीं कर लूँगा, चैन से नहीं बैठूँगा, सोने-चाँदी के बर्तनों में षट्रस भोजन न करूँगा, पलंग छोड़कर जमीन पर चटाई पर सोऊँगा। उन्होंने उदयपुर छोड़ कर कुम्भलगढ़ और गोगुन्दा के पहाड़ी इलाके को अपना केन्द्र बनाया।
हल्दीघाटी का युद्ध
जिस दौर में मुगल बादशाह पूरे भारत पर अपना शासन चलाते थे, उस वक्त एक मेवाड़ ही ऐसा प्रदेश था जहाँ मुगलों की हुकूमत को किसी राजपूत राजा ने स्वीकार नहीं किया। २०,००० राजपूतों को साथ लेकर राणा प्रताप ने मुगल सरदार राजा मानसिंह के ८०,००० की सेना का सामना किया। शत्रु सेना से घिर चुके महाराणा प्रताप को शक्तिसिंह ने बचाया।
चेतक का अन्त
महाराणा प्रताप का सबसे प्रिय घोड़ा चेतक था। हल्दीघाटी के युद्ध में बिना किसी सहायता के प्रताप अपने पराक्रमी चेतक पर सवार हो पहाड़ की ओर चल पड़े। घायल चेतक फुर्ती से नाला लाँघ गया, परन्तु मुगल उसे पार न कर पाये। उस बीच चेतक जमीन पर गिर पड़ा और जब प्रताप उसकी काठी को खोलकर अपने भाई द्वारा प्रस्तुत घोड़े पर रख रहा था, चेतक ने प्राण त्याग दिए।
इदं राष्ट्राय इदं न मम
धीरे-धीरे महाराणा प्रताप के सारे दुर्ग मुगलों के अधिकार में चले गये। गोगुन्दा और कुम्भलगढ़ के किले हाथ से निकल जाने पर उन्हें जंगल का आश्रय लेना पड़ा। वे अनेक वर्षों तक दुर्गम पहाड़ों और निर्जन जंगलों में भटकते फिरे। इसी समय मेवाड़ के गौरव भामाशाह ने महाराणा प्रताप के कदमों में अपनी अतुल सम्पत्ति रख दी। महाराणा इस प्रचुर सम्पत्ति से पुनः सैन्य संगठन में लग गए।
Shree Krishna Charitam
श्री कृष्ण - जन्म
मथुरा का अत्याचारी शासक कंस यूँ तो अपने को अजेय और अमर मानता था परन्तु उसे सबसे बड़ा भय अपनी चचेरी बहिन देवकी और उनके पति वासुदेव की होने वाली सन्तान से था। इसलिए प्रत्येक संतान को मृत्यु के घाट पहुँचाने का निश्चय कर कंस ने वासुदेव और देवकी को उनके महल में नजरबंद कर दिया और वहाँ अपनी वफादार दासियों को नियुक्त कर यह व्यवस्था कर दी कि वहाँ होने वाली प्रत्येक घटना की सूचना कंस को मिलती रहे। सात सन्तानों के कालकवलित हो जाने के पश्चात् वासुदेव और देवकी की आठवीं सन्तान के रूप में जब कृष्ण का जन्म हुआ तो बालकृष्ण को गोकुल में अपने मित्र नन्द के घर पहुँचाने में वासुदेव सफल हुए और इस प्रकार कृष्ण की जीवन रक्षा हुई।
जातकर्म संस्कार
नन्द बाबा को प्रयत्न पूर्वक श्रीकृष्ण के जन्म को गोपनीय रखना था पर बालकृष्ण के सभी संस्कार भी आवश्यक थे। वैदिक पद्धति में सोलह संस्कारों की व्यवस्था है तदनुरूप ही कृष्ण के संस्कार गोकुल में सम्पन्न हुए। उनका जातकर्म संस्कार बड़े ही उल्लासपूर्ण वातावरण में हुआ। यद्यपि इस बात का प्रयास भी निरन्तर रखा गया कि नवजात शिशु के पैदा होने की खबर कंस तक न पहुँच सके।
नामकरण संस्कार
कृष्ण माता यशोदा और नन्द बाबा की आँख के तारे थे। इन्हें देख-देखकर माता-पिता अघाते नहीं थे। संस्कारों की ही परम्परा में बालक का नाम कृष्ण रखा गया। नन्द और यशोदा की प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं था। ऋषि ने इस नामकरण संस्कार को सम्पन्न करवाया। यही बालक कृष्ण आगे चलकर महाभारत के सूत्रधार कृष्ण के रूप में लोकप्रिय हुए।
बचपन का शौर्य
श्रीकृष्ण के बालपन की अनेक घटनाएँ हमारे समक्ष आती हैं। श्रीकृष्ण बड़े नटखट थे। कई बार जिस काम के लिए उनको मना किया जाता था, बाल सुलभ भाव से वे उसी काम को करने में तत्पर हो जाते थे। ऐसे अनेक मनोहर प्रसंग हैं, जिनमें कृष्ण के नटखट स्वभाव के साथ शैशव में ही उनके बल का पता चलता है। ऐसी एक घटना थी माता बालकृष्ण को छकड़े के नीचे सुलाकर गई थीं। कृष्ण तुरन्त जग गए और खेलते हुए उन्होंने अपना पद प्रहार छकड़े पर किया तो छकड़ा उलट कर नीचे गिर गया। आवाज सुनकर माता दौड़कर आई, घबरा गई परन्तु श्रीकृष्ण को सकुशल देखकर उनकी जान में जान आई।
माँ और पुत्र - मनोरम छवि
बाल कृष्ण यद्यपि कुछ साँवले रंग के थे। परन्तु उनकी मुखाकृति और देहयष्टि इतनी सुन्दर और सुगठित थी कि जो भी उनको देखता वह देखता ही रह जाता था। माता यशोदा को तो जैसे कृष्ण के लालन पोषण के अलावा बाकी कोई कार्य रहा नहीं था। वे ज्यादा से ज्यादा समय कृष्ण को अपने पास ही रखना चाहती थीं। माता यशोदा और बाल कृष्ण की एक मनोरम छवि।
द्रौपदी स्वयंवर
प्राचीन समय में कुलीन कन्याओं के विवाह प्राय: स्वयंवर के माध्यम से होते थे। कई बार स्वयंवर जीतने के लिए कोई शर्त भी रख दी जाती थी ऐसी राजकुमारियों को वीर्यशुल्का भी कहा जाता था। राजकुमारी द्रौपदी के स्वयंवर में भी ऐसी ही शर्त रखी गई। नीचे तेल के भरे बरतन में ऊपर घूमती हुई मछली की परछाई को देखकर उसकी आँख को बींधने का कार्य इच्छुक राजकुमारों को करना था। इस कठिन कार्य को अन्ततोगत्वा एक तापस वेश में आये हुए सुन्दर और बलवान युवा ने किया जिसके बारे में बाद में सबको ज्ञात हुआ कि वे पाण्डु पुत्र प्रसिद्ध धनुर्धारी अर्जुन हैं।
ईश्वर - भक्त श्रीकृष्ण
प्राचीन इतिहास को हम जितना भी टटोलते हैं सर्वत्र विदित होता है कि तत्कालीन महापुरुषों के जीवन में ईश्वर के प्रति गहरी आस्था और विश्वास था। उनके दैनिन्दिन जीवन में संध्या, अग्निहोत्र, अतिथि सेवा, मानवेतर प्राणियों की रक्षा, बुजुर्गों की सुश्रूषा, इन सारे कर्त्तव्यों का निर्वहन दिखाई देता है। श्रीकृष्ण महाराज भी प्रात: संध्या और यज्ञ करते थे। वर्णन यह भी मिलता है कि जब कौरव सभा में संधि के लिए श्रीकृष्ण जा रहे थे तो प्रात:काल होने पर उन्होंने रथ रुकवाकर स्नानादि कर संध्या और अग्निहोत्र का कर्तव्य सम्पादित किया। युद्ध के बीच में भी अर्जुन इत्यादि महावीर सायंकाल युद्ध होने के पश्चात् संध्या करते थे ऐसा महाभारत में मिलता है।
द्रौपदी कुन्ती का मिलन
पाण्डव पुत्र के द्वारा स्वयंवर विजित कर लेने पर वहाँ उपस्थित अन्य राजा और राजकुमार क्रोधित अवश्य हुए और उन्होंने अपनी ओर से बाधा डालने की पूरी कोशिश की परन्तु भला महाबली भीम और उनके भाईयों के सामने किस की चल सकती थी। विवाह के पश्चात् पाँचों भाई द्रौपदी को लेकर उस कुटी में गए जहाँ उनका और माता कुन्ती का अस्थायी आवास था। माता कुन्ती को जब यह सुखद समाचार ज्ञात हुआ तो वे अत्यन्त प्रसन्न हुई। स्वयंवर के समय से ही कृष्ण को अंदाजा था कि हो न हो तापस वेश में ये पाँचों पाण्डव भाई ही हैं। फिर भी निश्चय करने की दृष्टि से वे इनके पीछे-पीछे गए और वहाँ अपनी बुआ कुन्ती को देखकर उन्हें निश्चय हो गया कि ये सभी उनके अपने सुहृद हैं।
कृष्ण - अर्जुन
यूँ तो सभी पाण्डवों की श्रीकृष्ण के साथ गहरी मित्रता थी बल्कि यह कहा जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सभी पाण्डव कृष्ण का बहुत आदर करते थे और श्रीकृष्ण भी छोटा होने के कारण युधिष्ठिर को बड़े भाई के समान आदर देते थे। परन्तु पाँचों भाईयों में से अर्जुन के साथ उनका सख्यभाव एक अलग ही ऊँचाई लिए हुए था। यही कारण था कि अपने मित्र अर्जुन का विवाह अपनी बहिन सुभद्रा से कराने में श्री कृष्ण ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
गीतोपदेश
महाभारत का युद्ध सज गया। दोनों ओर कुल मिलाकर अठारह अक्षौहिणी सेना एक दूसरे का विनाश करने के लिए तत्पर खड़ी थी। अर्जुन ने जब अपने समक्ष भीष्म को खड़े देखा जिनकी गोद में खेलकर के वे बड़े हुए थे, अपने गुरु द्रोणाचार्य को देखा, जिनसे सीखकर ही वे महान् धुनर्धारी बने, तो उनके मन में विषाद् उत्पन्न हुआ कि एक तुच्छ राज्य के लिए अपने इन आत्मीयों का वध करना उचित नहीं है और उन्होंने अपने हथियार नीचे रख दिए। ऐसे में श्रीकृष्ण ने धर्म के मर्म को समझाते हुए समष्टि हित के समक्ष वैयक्तिक हित को क्षुद्र बताते हुए अर्जुन को पुन: कर्तव्य पथ पर अग्रसर किया। उसके समस्त विषाद को दूर किया और युद्ध लड़कर धर्म राज्य की स्थापना करना ही पवित्र कर्तव्य बताया।
शर शय्या
महाभारत में कृष्ण के पश्चात् अगर किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा दिखाई देती है तो वे थे भीष्म। भीष्म अपने मन से तो सदैव धर्म मार्ग पर रहे अत: उनका आशीर्वाद धर्म मार्ग पर चलने वाले पाण्डवों के साथ रहा। परन्तु राजधर्म की प्रतिज्ञा के बन्धन में बंधकर महाभारत के युद्ध में नेतृत्व उन्होंने कौरव सेना का किया। भीष्म को अपने सम्मुख देखकर के अर्जुन की युद्ध गति कई बार मंद पड़ जाती थी ऐसे में श्रीकृष्ण उन्हें अपने कर्तव्य का स्मरण करवाते थे। अन्ततोगत्वा महारानी द्रौपदी के भाई महावीर शिखण्डी के प्रहारों के सम्मिलित होने पर भीष्म बुरी तरह घायल होकर गिर पड़े। भीष्म के शरीर में इतने बाण थे कि वह शर शय्या के नाम से प्रसिद्ध हुयी। अपनी इसी स्थिति में सायंकाल अपने पास आने वाले पाण्डवों को भीष्म ने प्रशस्त धर्मोपदेश भी दिए।
महाविनाश (१)
महाभारत- युद्ध का परिणाम क्या होना था यह आशंका तो सभी को थी यही कारण था कि श्रीकृष्ण ने अंतिम समय तक दुर्योधन के नेतृत्व में कौरव पक्ष को समझाने की कोशिश की। 'परन्तु विनाशकाले विपरीत बुद्धि' की उक्ति के अनुसार धृतराष्ट्र तो पुत्र मोह में जकड़े हुए थे, भीष्म पर अपनी प्रतिज्ञाओं का प्रतिबन्ध था और दुर्योधन निर्द्वन्द्व था। जब दुर्योधन ने यह कह दिया कि सुई की नोंक के बराबर भी जमीन पाण्डवों को नहीं दूँगा, कौरव वंश का समूल विनाश सुनिश्चित हो गया था। इस चित्र में दर्शायी गई स्थिति के अनुसार महिलाओं के समक्ष अपने परिजनों के शवों पर विलाप करने के अतिरिक्त और कोई मार्ग शेष नहीं था।
महाविनाश (२)
महाभारत- युद्ध का परिणाम क्या होना था यह आशंका तो सभी को थी यही कारण था कि श्रीकृष्ण ने अंतिम समय तक दुर्योधन के नेतृत्व में कौरव पक्ष को समझाने की कोशिश की। 'परन्तु विनाशकाले विपरीत बुद्धि' की उक्ति के अनुसार धृतराष्ट्र तो पुत्र मोह में जकड़े हुए थे, भीष्म पर अपनी प्रतिज्ञाओं का प्रतिबन्ध था और दुर्योधन निर्द्वन्द्व था। जब दुर्योधन ने यह कह दिया कि सुई की नोंक के बराबर भी जमीन पाण्डवों को नहीं दूँगा, कौरव वंश का समूल विनाश सुनिश्चित हो गया था। इस चित्र में दर्शायी गई स्थिति के अनुसार महिलाओं के समक्ष अपने परिजनों के शवों पर विलाप करने के अतिरिक्त और कोई मार्ग शेष नहीं था।