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Satyarth Prakash Nyas / सम्पादकीय  / भानुमती ने कुनबा जोड़ा

भानुमती ने कुनबा जोड़ा

समें कोई दूसरी राय हो ही नहीं सकती कि देश की जनता भ्रष्टाचार से त्रस्त है। वर्तमान स्थापित तंत्र में इससे लड़ने की, इसे इसमाप्त करने की इच्छाशक्ति ही नहीं है। अतः भ्रष्टाचार विरोधी किसी भी आन्दोलन का स्वागत होगा ही, यह सुनिश्चित है।
और यह हुआ और आश्चर्यजनक तरीके से हुआ। दिल्ली में ‘आप’ का उदय एक नई आशा लेकर आया। ‘आप’ की अप्रत्याशित सफलता ने जनमानस का मूड़ जाहिर कर सभी पार्टियों को चेतावनी दे दी। पूर्ण बहुमत दिल्ली में किसी को नहीं मिला। ‘आप’ नेता केजरीवाल ने स्पष्ट घोषित कर दिया कि वे न भाजपा और न कांग्रेस किसी से समर्थन नहीं लेंगे। नैतिक तौर पर तो यह घोषणा अत्यन्त उचित थी क्योंकि आखिर चुनाव के दौरान ‘आप’ ने इन दोनों ही दलों पर बेशुमार वार किए थे। इधर भाजपा भी समर्थन के अभाव में सरकार नहीं बना पा रही थी। अतः शीघ्र पुनः चुनाव होना तय लग रहा था। ऐसे में आश्चर्यजनक घटना घटी। कांग्रेस के समर्थन से ‘आप’ ने सरकार बना ली। ऐसा क्योंकर हुआ इस आलेख में इसकी चर्चा नहीं करेंगे। आप की सरकार बनते ही दिल्ली की जनता की आशाओं का सैलाब उमड़ पड़ा। परन्तु मात्र 20-25 दिनों में ही केजरीवाल के बदलते बयान, उनकी प्रशासन पर कमजोर पकड़, दिल्ली के बाद लोकसभा में प्रदर्शन दोहराने की जल्दबाजी, ‘आप’ के मंत्रियों के अहंकारपूर्ण रवैये ( जो केजरीवाल के इस कथन ‘हाँ मैं हूँ अराजकतावादी’ के कारण स्तब्ध लोकतंत्र में परिलक्षित हो रही है) ने जनता की आशाओं पर तुषारापात कर दिया है। इस पर भी बहुत कुछ लिखने को है। पर बीते महीनों में जो सबसे बड़ी चीज नजर आयी वह है ‘आप’ के नेताओं में गंभीर आर्थिक, सामरिक, देश की अखण्डता से संबंधित विषयों में मतैक्य नहीं है। कई मुद्दों पर तो वे दो विपरीत किनारां पर खड़े नजर आते हैं। किसी एक मुद्दे को लेकर आन्दोलन में परस्पर भिन्न विचारधारा वाले लोगों में सहयोग अस्वाभाविक नहीं होता क्योंकि वे आन्दोलन के मुख्य मुद्दे पर एकमत होते हैं। अन्ना आन्दोलन भ्रष्टाचार के विरुद्ध व जनलोकपाल लाने हेतु था। अतः वहाँ यह चिन्त्य था ही नहीं कि देश के समक्ष अन्य जो गंभीर मुद्दे हैं उनमें आन्दोलनकारियों की राय मिलती थी या नहीं। पर उक्त आन्दोलन से अन्ना का साथ छोड़ ‘आप’ का जन्म हुआ। ‘आप’ क्योंकि एक राजनीतिक दल है, अतः यह अत्यावश्यक है कि राष्ट्र की संप्रभुता, संविधान की सर्वाच्चता, लोकतांत्रिक प्रशासनिक पद्धति, आर्थिक व सामरिक नीतियों में इस पार्टी का सुनिश्चित मत हो। परन्तु अल्प समय में ही यह स्पष्ट हो गया है कि ‘आप’ पार्टी भानुमति के कुनबे जैसी है। सबसे पहले व सबसे गंभीर प्रश्न पर ‘आप’ के महत्वपूर्ण सदस्य श्री प्रशान्त भूषण का वक्तव्य आया। जितने भी राजनीतिक दल हैं सभी इस बारे में सुनिश्चित मत रखते हैं कि कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है और वहाँ पर ‘ला एंड आर्डर’ की समस्या से निपटने का अधिकार सरकार को उसी प्रकार है जिस प्रकार कि किसी अन्य राज्य के संदर्भ में। प्रशान्त भूषण ने इस भावना के विपरीत एक टीस पैदा करने वाला बयान दे दिया। देश स्तब्ध रह गया। केजरीवाल ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि यह प्रशान्त की अपनी राय है, ‘आप’ की नहीं। परन्तु केजरीवाल ने यह नहीं बताया कि इस संवेदनशील मुद्दे पर आप पार्टी की क्या राय है? यह भी चिन्ता है कि ऐसे गंभीर मसलों पर भिन्न राय रखने वाले केजरीवाल और प्रशान्त भूषण की ट्यूनिंग कैसे बैठेगी? विपरीत विचारधाराओं वाले घटकों के संगठन निर्णय की घड़ी में सफल नहीं हो सकते।
इसी प्रकार हमने देखा कि एफ.डी.आई. के पूर्व सरकार के निर्णय को ‘आप’ ने पलटकर दिल्ली में एफ.डी.आई का रास्ता रोक दिया। इस पर ‘आप’ के एक सदस्य के.गोपीनाथ ने पार्टी के निर्णय की आलोचना कर दी। यह भी सामान्य नहीं नीतिगत संदर्भ था।
वी.आई.पी.कल्चर को समाप्त करने का दावा करने वाली ‘आप’ के प्रमुख सदस्य कुमार विश्वास की बात करें तो इनके वी.आईपी. रवैये से तो ‘आप’ के कार्यकर्ता ही खासे नाराज हैं। इनके अहंकारपूर्ण तरीके ने अशोक चक्रधर जैसे गंभीर साहित्यकार को भी
टिप्पणी करने पर मजबूर कर दिया। हाल ही में ‘आप’ की सदस्या मल्लिका साराभाई ने कुमार विश्वास की आलोचना की है। आप पार्टी का आज सर्वप्रमुख निशाना नरेन्द्र मोदी हैं। परन्तु कुमार विश्वास ने नरेन्द्र मोदी की शान में पढ़ी कविता में उनकी तुलना भगवान शिव से की है। यहाँ यह कहा जा सकता है कि व्यक्ति के किसी के बारे में विचार बदल सकते हैं। बिल्कुल ठीक है। हम मानते हैं। परन्तु स्तुति और निन्दा के दो अंतिम छोर, व्यक्त करने वाले की विश्लेषण क्षमता पर सवाल तो पैदा करते ही हैं। विश्वास को यह बताना चाहिए कि जब उन्होंने वह कविता पढ़ी थी तब मोदी में ऐसी क्या विशेषताएँ थीं और अब उनमें क्या न्यूनताएँ आ गई हैं जो उनके बारे में विश्वास को अपनी राय पूर्णतः विपरीत कायम करनी पड़ी। या फिर वे स्वीकार करें कि उनकी कविताएँ उनकी निजी भावनाओं की नहीं वरन् बाजारू प्रवृत्ति की परिचायक हैं ‘जिसकी शादी उसके गीत’ की तर्ज पर आयोजकों आत्म
निवेदन मार्च 2014
भानुमती ने कुनबा जोड़ा
की प्रशंसा करना उनका फर्ज बनता है, उन्होंने इसी कार्य को बढ़-चढ़कर किया है। कुमार विश्वास ने कभी मलियाली नर्सों पर अभद्र टिप्पणी की थी। आज ‘आप पार्टी’ की सदस्य केरल की ख्यातनाम लेखिका सोज ने इसकी तीव्र आलोचना की है। जहाँ केजरीवाल की घोषणा है कि हम प्रार्थी के प्राथमिक सदस्य भी स्क्रीनिंग करके बनाएँगे वहाँ पार्टी की महाराष्ट्र इकाई की नेता अंजली दामनिया, अरुण गवली, दाऊद जैसे कुख्यातों को ‘आप पार्टी’ में आमन्त्रित करती प्रतीत होती हैं।
शीला दीक्षित पर घोषित समयावधि 7 दिन के अंदर कार्यवाही न करने पर (कामनवैल्थ गेम्स घोटाले के संदर्भ में) ‘आप’ के ही विधायक बिन्नी ने विरोध के स्वर बुलन्द कर दिए। अब इनमें टीना शर्मा भी शामिल हो गई हैं। यद्यपि केजरीवाल का कहना है कि बिन्नी डॉ. हर्षवर्द्धन की बोली बोल रहे हैं। पारम्परिक राजनीतिक परम्परा के विपरीत दागी नेताओं से किनारा करने वाली पार्टी के प्रमुख अनेक आरोपों में लगातार घिरते जा रहे सोमनाथ भारती की जिस प्रकार रक्षा कर रहे हैं वह एक प्रश्नचिँ खड़ा कर रहा है। ऐसे अनेक विरोधाभास मात्र एक-डेढ़ माह के समय में ही उभर आए हैं। इस पर भी सरकार चलाने का अभिनव केजरीवाल प्रकार अलग चिन्त्य है।
यहाँ एक तथ्य अवश्य उल्लेखनीय है कि ‘आप’ के उदय ने पूरे देश भर के राजनीतिज्ञों के व्यवहार में अकल्पनीय परिवर्तन किया है। वी.आई.पी. कल्चर को खत्म करने की दिशा में आप ने जो सराहनीय कदम उठाया है, अनेक राज्यों के मुख्यमंत्रियों के काफिलों की लम्बाई आश्चर्यजनक रूप से कम हो गई। लालबत्तियों के प्रयोग से भी कोताही की जा रही है। ट्रेफिक सिग्नल पर आम आदमी की तरह सरकार भी ठहर कर ‘आम’ आदमी के मूड का जायजा ले रही है। ये परिवर्तन निरन्तरता को प्राप्त होते हैं तो श्रेयस्कर हैं। इनका श्रेय केजरीवाल को जाता है। इसी प्रकार भ्रष्टाचार के समूल को नष्ट करने की कवायद प्रारम्भ हो तो कहना ही क्या है।
भारीभरकम चुनावी वायदों के बोझ से शहीदाना अंदाज में छुटकारा पाने के अवसर का बेसब्री से इन्तजार कर रहे केजरीवाल ने बिना जनता से राय लिए त्यागपत्र देकर लोकसभा चुनावों के माध्यम से देश का सरताज बनने की आकांक्षा से अपने कदम आगे बढ़ा दिए हैं। परन्तु अब और भी आवश्यक है ‘आप पार्टी’ सभी महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी एकमत राय जनता के समक्ष स्पष्ट करे।
‘आप पार्टी’ के दृष्टिकोण से देखा जाए तो पार्टी के भीतर मुद्दों पर पृथक्-पृथक् राय होना भी एक विशेषता है। इसे भी विचार स्वातन्त्र्य की विशेषता कहेंगे। वस्तुतः किसी भी आन्देलन में एक हेतु लेकर भिन्न-भिन्न विचारधारा के लोग मिल सकते हैं यह नितान्त स्वाभाविक है। अन्ना आन्दोलन तक यह ठीक था। पर जब केजरीवाल ने अन्ना का साथ छोड़ राजनीतिक पार्टी गठित कर ली तो एक पार्टी के रूप में सदस्यों को व्यवहार करना होगा। भ्रम की गुंजाइश को यथाशीघ्र मिटाने हेतु पार्टी के सभी मुद्दों पर स्पष्ट रूप से अपने दृष्टिकोण को अभिव्यक्त कर देना चाहिए। परन्तु घटनाएँ बताती हैं कि इस संदर्भ में ‘आप’ अभी भी गम्भीर नहीं है। मुकेश अंबानी के संदर्भ से यह स्पष्ट है। केजरीवाल साहब ने मुकेश अंबानी के खिलाफ थ्प्त् दर्ज करायी है। ‘आप’ के वरिष्ठ नेता योगेन्द्र यादव का कथन है कि अगर अंबानी चन्दा देंगे तो वह स्वीकार्य होगा। तो दूसरी ओर ‘आप’ प्रवक्ता दिलीप पाण्डे कह रहे हैं कि अंबानी से पैसा कदापि स्वीकार्य नहीं होगा। ऐसी स्थिति में यह चिन्त्य है कि यह पार्टी क्या वास्तव में गम्भीर भूमिका निभाने में सक्षम साबित होगी? ‘आप’ को यह समझना ही होगा कि वे अब आन्दोलन की नहीं सरकार बनाने की भूमिका में हैं। और ऐसे में इसके सदस्यों का ‘भानुमती के कुनबे’ के रूप में अधिक समय तक परिलक्षित होना पार्टी के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं होगा।

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