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मेकिंग ऑफ आसाराम
BY JULY 5, 2026

मेकिंग ऑफ आसाराम

गुरु की महत्ता व आवश्यकता के बारे में भारतीय मनीषा कभी भी सन्देहयुक्त नहीं रही। ऋग्वेद 2.13.11 का भाष्य करते हुए महर्षि दयानन्द लिखते हैं- ‘जिनको वेदों के पारंगत विद्वान् अध्यापक प्रेम से बुद्धि प्रदान करते हैं, वे कभी भी दुःखी और निन्दित नहीं होते।’ अर्थात् गुरुजन दुःख व निन्दा से बचाकर सुख व यश की वृद्धि कराते हैं। यही कारण है कि हमारे देश में ऋषि मुनि विद्वान् सर्वत्र पूजित रहे। ऋषि विश्वामित्र जिस समय यज्ञ की रक्षार्थ राम-लक्ष्मण को माँगने दशरथ के पास आए थे तब दशरथ पुत्र मोह से ग्रस्त हो इस हेतु अनिच्छुक थे। परन्तु गुरु वशिष्ठ के कहने पर उन्होंने राम व लक्ष्मण को विश्वामित्र के सुपुर्द कर दिया। गुरु के पास कितने अधिकार होंगे तनिक कल्पना कीजिए कि राम का विवाह भी विश्वामित्र की स्वीकृति से तय हो गया। महाराज दशरथ को तो बाद में सूचना दी गई। भारत में आज भी गुरु गौरव का यही भाव विद्यमान है। परन्तु गुरु शिष्य के व्यक्तित्व की बात तो बाद में करेंगे, इस परम्परा का मूल उद्देश्य और उद्देश्य प्राप्ति का साधन बदल गया। जहाँ पूर्व में गुरु अपने अन्तेवासी शिष्य को ठीक उसी प्रकार सहेजते हुए जिस प्रकार कि माता गर्भस्थ शिशु को सहेजती है उसका हित साधन करती है, शिष्य का चारित्रिक विकास करते हुए, नाना प्रकार की अविद्या को दूर कर, अलंकृत कर राष्ट्र के सुयोग्य नागरिक के रूप में निर्माण करता था, वह भाव आज पूर्णतः विलुप्त है। स्मरण कीजिए यदि वशिष्ठ-विश्वामित्र न होते तो क्या राम का निर्माण हो पाता? गुरु अगस्त्य न होते तो क्या हनुमान निर्मित होते? सान्दीपनि न होते तो क्या कृष्ण समस्त कलाओं के साथ चमक पाते? चाणक्य न होते तो क्या चन्द्रगुप्त चक्रवर्ती सम्राट होने की सोचता भी? यदि समर्थ गुरु रामदास न होते तो क्या शिवाजी का अस्तित्व होता? और यहाँ यह भी साथ ही विचार कर लीजिए इन महान् प्रतापी, परमैश्वर्यशाली शिष्यों को जन्म देने वाले गुरुजनों के समक्ष भौतिक सम्पदा का क्या कोई महत्व था? ये सभी राष्ट्र निर्माता पर्णकुटी में ही विराजते रहे। गुरु को ही क्यों दोष दिया जाए क्या आज के शिष्यगण ऐसे गुरु चाहते भी हैं? जब तक देश में जीवन निर्माता, निर्लोभी, चरित्रवान, मानवता के हितसाधक सन्त रहे, उनके प्रति पूज्यभाव स्वाभाविक व अपरिहार्य था। उन्हें न शिष्यों से कोई मूर्त अपेक्षाएँ थीं न राजाओं से। गुरुवर दण्डी स्वामी विरजानन्द जी ने अलवर नरेश का त्याग केवल इस कारण कर दिया कि वे एक दिन प्रमादवश निर्धारित समय पर गुरु के समक्ष नहीं पहुँचे। इन्हीं गुरु विरजानन्द ने दयानन्द के लाए लौंग अस्वीकृत कर दिए। हाँ, मानवता की भलाई हेतु, राष्ट्र के उत्थान हेतु जुट जाने का वचन अवश्य लिया। शिष्य भी ऐसे ही थे। श्रीराम, श्रीकृष्ण, हनुमान, चन्द्रगुप्त, शिवा, दयानन्द ने सारा जीवन गुरु निर्देश पर राष्ट्र व मानवता की भलाई हेतु अर्पित कर दिया। अस्तु
अब न वैसे गुरु हैं न शिष्य। हाँ, विरासत में गुरु के प्रति जो आदरभाव की परम्परा रही है वह अभी भी विद्यमान है (चाहे विकृत रूप में सही)। इसी श्रद्धा-आस्था का लाभ चतुर बाजीगर उठा रहे हैं। शिष्य भी गुरु से चारित्रिक निर्माण नहीं चाहते। निःसंतान शिष्य पुत्र चाहते हैं, गरीब शिष्य धन चाहता है, नेता शिष्य चुनाव में विजय चाहता है, मुकदमें में फँसा शिष्य मुकदमे में जीत चाहता है। गरज यह कि सर्व समृद्धि हेतु अध्यात्म और अष्टांग योग की शिक्षा किसी को दरकार नहीं, दर्शन, उपनिषद, वेद की शिक्षाओं पर चलने की नहीं, इन्हें चमत्कारिक टोने-टोटके की, किसी तथाकथित गुरुमंत्र की, बीजमंत्र की अथवा ऐसे चमत्कारिक हस्तस्पर्श या अन्यान्य क्रिया की आवश्यकता है जो चुटकी बजाते उनकी सारी समस्याओं का समाधान कर दे। कुछ मुक्ति सुख के अभिलाषी हो सकते हैं इससे इन्कार नहीं किया जा सकता, पर वे इसके लिए यम-नियम साधना के अभिलाषी नहीं हैं, वे आसान साधन चाहते हैं।
मोटे तौर पर आज यह स्थिति है। न शिष्य को सच्चा गुरु चाहिए और न गुरु को मुमुक्षु शिष्य। दयानन्द ने जब गुरु विरजानन्द का दरवाजा खटखटाया तो गुरु ने पूछा ‘कौन हैं?’ शिष्य का उत्तर था- ‘भगवन्! यही तो जानने आया हूँ कि मैं कौन हूँ’ आज के संदर्भ में ऐसे संवाद पूर्णतः अप्रासंगिक हो चुके हैं। यहीं से प्रारम्भ होती है ‘मेकिंग ऑफ ए गुरु/ आसाराम/ की प्रक्रिया।
जी हाँ दोष केवल आसाराम जी या ऐसे ही अन्य गुरुओं को मत दीजिए इसके लिए जिम्मेदार मैं और आप हैं। क्या आपने गुरु-वरण से पूर्व सोचा है कि गुरु कैसा होना चाहिए? वेद में गुरु की अनेक अर्हताओं में से कुछ निम्न हैं। जितेन्द्रिय धार्मिक, परोपकारप्रिय विद्वान् हो। (यजु. 12/59), शुद्ध आचरण वाले, सत्यवादी महान् आत्मा वाले हों (ऋ आत्म
निवेदन जनवरी 2014
मेकिंग ऑफ आसाराम
2/42/3), सूर्य के समान प्रकाशित आत्मा वाले, जितेन्द्रिय और सुशील हों (यजु. 33/34)। सन्तों को परिभाषित करते हुए कहा है कि वे योगविद्यारूपी ऐश्वर्य से सम्पन्न, सत्योपदेश से सुख उपजाने वाले, ब्रह्मनिष्ठ विद्वान् संन्यासी हों (ऋ1/119/9), पूर्ण विद्या वाले आप्त, राग-द्वेष तथा पक्षपात से रहित, सर्वथा सत्यमय, असत्य का त्याग करने वाले, जितेन्द्रिय, योगसिद्धान्त को प्राप्त किए, पर तथा अपर के ज्ञाता, जीवनमुक्त, वेदों के ज्ञाता हों (ऋ 1।119।8)। अब पाठकगण स्वयं विचार करें कि गुरु का चयन करते समय क्या आप उसकी योग्यता का ध्यान रखते हैं? उपरोक्त में से कुछ प्रतिशत गुण धारण करने वाले भी यदि आचार्य हों तो पृथ्वी का वातावरण ही बदल जाय। तथाकथित जालसाज गुरुओं द्वारा यह भी प्रचारित किया जाता है कि गुरु-परीक्षा नहीं करनी चाहिए बस श्रद्धापूर्वक ग्रहण कर समर्पित हो जाना चाहिए। यह बात इसलिए प्रचारित की जाती है कि उनकी पोल न खुल जाए। जब आप 10 रु. का मटका भी ठोक बजाकर खरीदते हैं तो जिसे आप अपने तथा अपने परिवार के जीवन का निर्माण कार्य सौंपते हैं उसकी परीक्षा योग्य क्यों नहीं है?
यह भी है कि परीक्षा तो आप करते हैं पर उसके मापदण्ड आपने बदल दिए हैं। आज के युग में निम्न मापदण्ड ही देखे जाते हैं।
1.किस गुरु के यहाँ कितनी भीड़ होती है।
2.कौन गुरु कितनी अधिक गारन्टी के साथ आपको कष्टों से मुक्त कर देने करा दावा करता है।
3. किस गुरु के शिष्यों में वी.आई.पी. तथा वी.वी.आई.पी कितने हैं। 4.कम से कम पुरुषार्थ व निवेश से अधिकतम लाभ कौन दिला सकता है?
विद्या, तप, वैराग्य, जितेन्द्रियता, सादगी जैसी कसौटियाँ तो जैसे बीते युग की बात हो गईं। जिन लोगों ने धर्मगुरु होने को एक प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है वह ठीक एक दूसरे व्यापारी की भाँति मार्केटिंग में विश्वास रखते हैं। जिसकी जितनी अच्छी मार्केटिंग उतना ही ज्यादा सफल गुरु। ऐसे परिवेश में मुझे कहने दीजिए कि आसाराम/नारायण साईं/नित्यानन्द/इच्छाधारी बाबा/ कृष्णावतार बाबा के मेकर आप और हम हैं। एक व्यक्ति कुछ चमत्कारों/हाथ की सफाई को दिखाकर भीड़ को आकर्षित करता है। धीरे-धीरे भीड़ बढ़ती है तो जन-बल को अपने प्राणस्वरूप समझने वाले वी.आईपी. नेता भीड़ में शामिल हो जाते हैं। बाबा पर सत्तामद चढ़ने लगता है। पान खाकर जो पीकदान में पीक थूँकता है और उसे
प्रसाद रूप में वितरित करता है, जैसे ही ग्रहणकर्त्ताओं की पंक्ति में खड़े होते हैं आप मेकिंग ऑफ कृष्णवतार का हिस्सा बन जाते हैं। जबर्दस्त मार्केटिंग, जबर्दस्त प्रचार-बाबा की महिमा अपरम्पार। आज ये बाबा एक उच्चाधिकारी की दो बेटियों के साथ दुष्कर्म करने के फलस्वरूप जेल में है। मुम्बई स्थित एक परिवार में नववधू के सन्तान उत्पन्न नहीं हो रही थी, कुलगुरु ने बताया कि ‘एक बुरी प्रेतात्मा ने वधू के शरीर पर कब्जा कर रखा है। रात्रि में एक बजे वधू के साथ बन्द कमरे में अनुष्ठान करना होगा। आत्मा शरीर छोड़ते वक्त काफी चीखेगी-चिल्लाएगी पर आप लोग अधीर न होना।’ इस अनुष्ठान में क्या हुआ होगा पाठक भलीभाँति समझ सकते हैं। पर हम बलपूर्वक कहना चाहते हैं कि जैसे ही आप ऐसी अविद्याजन्य बातों पर विश्वास करना प्रारम्भ करते हैं आप ढांगियों को फैलने का अवकाश प्रदान कर मेकर ऑफ आसाराम/…..बन जाते हैं। एक व्यक्ति के स्वप्न पर पूरी की पूरी सरकार सोना प्राप्ति की अभिलाषा लेकर खुदायी में जुट जाती है तो ऐसे देश में तो सभी ‘मेकर्स ऑफ आसाराम’ बन जाते हैं। मूर्खता की भी कोई सीमा होता है।
इसी प्रकार आप चंगाई के व्यापार में मालामाल होते जा रहे दिनाकरन के साम्राज्य में शामिल होते हैं अथवा पीर-फकीरों से हर दुःख के निवारण हेतु यन्त्र-मंत्र ताबीज लेने वालों की भीड़ में सम्मिलित होते हैं, अथवा इस प्रकार की अविद्याजन्य बातें फैलाने में सहायक बनते हैं तो ऐसे वर्गों को प्रोत्साहन दे रहे होते हैं। आसाराम जी की बात करें तो वे सबसे विशिष्ट हैं। अभी तक धर्माचार्यों में वंशवाद नहीं चला था इन्हांने वह कमी भी पूरी कर दी। नारायणसाईं भी भगवान बन गए। पुत्र भी क्या शानदार? बाप एक कदम तो बेटा दस कदम। ‘बाप बेटा एंड कम्पनी’ की सम्पत्ति अकूत है। 450 आश्रम हैं। पुलिस द्वारा बाप को गुजरात से जोधपुर सड़क मार्ग से ले जाया गया तो जोड़-जोड़ दर्द करने लगे। चार्टर प्लेन की माँग करते रहे। क्या रईसी है। बेटा 13 करोड़ रुपये तो सिर्फ रिश्वत में दे रहा है। यह अकूत सम्पत्ति ‘मेकर्स ऑफ आसाराम’ की ही तो है। इन्हें कभी विचार नहीं आया कि जब चक्रवर्ती सम्राट बनने वाला चाणक्य एक पर्णकुटी में रहता था तो आलीशान तथाकथित साधना कुटियाओं में निवास करने वाले ये भगवान तपोनिष्ठ कैसे हो सकते हैं? इनके आश्रम में तहखाने क्यों बने हैं? सुरंगें क्यों निकल रही हैं। जब ये साधिकाओं को ओशो आश्रम में उन्मुक्त क्रीड़ाओं की शिक्षा लेने भेजते थे तब उन साधिकाओं को पृथक् क्यों नहीं हो जाना चाहिए था? अपना सब कुछ बेचकर आश्रम में धन लगाने वाले भक्तों को इनकी गुरु-गीता के इस निर्देश पर ऐतराज क्यों नहीं था कि ‘भक्तों को अपनी पत्नी भी गुरु को समर्पित कर देनी चाहिए।’ कभी आपने विचार किया नाना प्रकार के राजसी वस्त्राभूषण व पगड़ियाँ पहनने वालों का वैराग्य से क्या संबंध हो सकता है? नाच-नाचकर प्रवचन देने की कला न्यारी आविष्कृत की गई है। अब पता चला कि यह एक विशिष्ठ प्रकार की ‘मोडस आपरेन्डी’ थी जो महिला साधिकाओं को चिँत करने हेतु बाप-बेटे अपनाते थे। परन्तु टार्च की रोशनी डाल शिकारों को चयन करने की पद्धति के बारे में झूमते भक्त कुछ न जान सके। आखिर एक साधारण-सा व्यक्ति आसाराम हरपलानी आसाराम बापू कैसे बना? उत्तर है अविद्या में आकंठ डूबे जन-समूह के कारण। आसाराम जी का हैलीकाप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। तब एक बड़े राजनीतिक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने जब इसे आसाराम जी की दैवीय शक्तियों का चमत्कार बताया तब क्या वे ‘मेकर ऑफ आसाराम’ नहीं बन रहे थे?
पाठकगण! मुझे कहने दीजिए कि जैसे ही आप स्वीकार करते हैं कि यम-नियमों की कठिन साधना की बात न कर ये जितने भी सन्त/गुरु/बाबे जब एक गुरुमंत्र/बीजमंत्र के सहारे अभ्युदय तथा निःश्रेयस की प्राप्ति कराने की बात करते हैं तथा आप स्वीकार करते हैं तो आप मेकर्स की भीड़ में शामिल हो जाते हैं। तब आपको कई गुणा होती इनकी सम्पत्ति तथा उसका रहस्य भी नहीं दिखता। बिना वैराग्य साधना के ये जितेन्द्रिय कैसे हो सकते हैं यह भी आपके ध्यान में नहीं आता। दरअसल आप की मानसिकता ऐसी बना दी जाती है कि गुरु पर कोई शंका भी आपको पाप लगने लगती है। बीजमंत्रों/मन्त्राशों द्वारा बड़ी-बड़ी सभाओं में भक्तों की समस्त इच्छाएँ किस प्रकार पूर्ण हो गईं, इसका प्रदर्शन मार्केटिंग चातुर्य है। इसी मार्केटिंग के कारण नई-नई दुकानें चालू हो जाती हैं। पुरानी बंद दुकानें पुनः उद्घाटित हो जाती हैं। निर्मल बाबा की बन्द दुकान फिर चालू हो गई। इन्होंने डायबिटीज के मरीज एक प्रोफेसर को मनोकामना पूर्ति हेतु खीर खिलाकर बीमार कर दिया। ध्यान रक्खें भक्त एक पढ़े-लिखे प्रोफेसर थे। अविद्या का साम्राज्य देखिए कि लाल टोपी, आँखों में काजल तथा तंत्र-टोने का सहारा लेकर ये बाप-बेटे दुष्कर्मों की सजा से बचने का जुगाड़ कर रहे हैं। वस्तुतः आज की शिक्षा, आज का वातावरण आपको अविद्या से नहीं बचाता। जब तक आप इनके हथकण्डों पर विश्वास करते रहेंगे आसाराम/नारायण/इच्छाधारी/……की मेकिंग होती रहेगी चाहे इनके एक के बाद एक घोटाले सामने आते रहेंगे इस सत्यानाशी गुरुडमवाद से आप नहीं निकल पायेंगे। राष्ट्र का बौद्धिक अधःपतन होता रहेगा। अतएव ऐसे बाबाओं की ‘मेकिंग’ से बचिए।